
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
सोलूं अध्याय - श्लोक (१३ बटि २४ तक)
इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम्।।१३।।
असौ मया हतः शत्रुहनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी।।१४।।
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।१५।।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजाल समावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।१६।।
कुमाऊँनी:
आसुरी स्वभाव वाल् मनखि सोचूं कि आज म्यर् पास यतुक् छू भोल् हैं यतुक् है जाल् और भविष्य में और ज्यादे है जाल्। फलांण म्यर् दुस्मण छू वीक् नाश करूल् फिरि जो औरलै दुस्मण छीं उनर् लै नाश करूल् फिरि मैं शक्तिशाली और धनवान बणूल्। मैं ई सब्बूं है ठुल् और कुलीन छूं, मेरि पास धन-संपदा लै खूब छू, मैं यज्ञ और दान करिबेर् नाम कमूल्। यसिकै ऊ अज्ञानक् कारण मोहग्रस्त है रूं और मोहजाल में फंसते हुए इन्द्रियों क् भोग में संलिप्त और आसक्त होते हुए अपंण ल्हिजी नरकक् द्वार आफ्फी खोलूं।
(अर्थात् आसुरी प्रवृत्ति येसि छू कि मनखिकि इच्छा अनेक प्रकारैल् बड़ते रूनीं, आज इतुक् भोल् हैं उतुक् करते -करते ऊ यौ भुलि जां कि मैं कदुक् पाप करनयू। ऊ भल् या नक् रूपैल् धन-संपत्ति इकट्ठ करंण में लागी रूं और यौ इच्छा जो छु कभ्भीं पुरि नि हुंनि। यस् मनखि अपणि धन, संपति, ऐश्वर्य, भूमि, भवन आदि में यतुक् मगन है जां कि भगवान् कैं त् भुलि जां और इन्द्रिय भोगादि में अपंण जीवन नष्ट करूं और नरकगामी बणौं।)
कामाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता।।१०।।
चिन्तामप्रमेयां च प्रलयानातामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतिवदिति निश्चिताः।।११।।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यानेनार्थसञ्चयान्।।१२।।
कुमाऊँनी:
कभ्भीं पुरि नि हुंणी कामाग्निक् सहार ल्ही बेर् अभिमान और झुटि बड़ाईक् चक्कर में डुबी राक्षसी प्रवृत्ति वाल् लोग मोहग्रस्त है बेर् नाशवान चीजों द्वारा अपवित्र कर्म या भोगन् में लागी रूनीं। ऊं यस् समजनीं कि इन्द्रियों कि तृप्ति मात्र मनखिक् मुख्य काम छू, येक् ल्हिजी यस् मनखि मरण-मरण तक जांलै भौत्तै चिन्ता ग्रस्त रूनीं और काम क्रोध सहित इन्द्रिय तृप्ति क् ल्हिजी बस धनसंग्रह करण में लागी रूनीं।
(अर्थात् आसुरी स्वभाव एक प्रकारक् घूंण छू, जो दिन प्रतिदिन मनखिक् विवेक कैं खानैं रूं, और आसुरी स्वभाव वाल् मनखि भोग में यतुक् लिप्त है जां कि ऊ भोग कैं या इन्द्रियों कि तृप्ति कैं ई मनखि जीवनैकि उपलव्धि मानि बेर् भै जां। दिनोंदिन विकि इच्छा बड़तै जानीं और उन् इच्छाओं कैं पुर करण में ऊ हिर (हीरा) जस् जनम कैं धनसंग्रह करन-करनैं खतम करि द्यूं, और भगवान् ज्यु उज्याणि वीक् ध्यान् रूनैं नैं।)
हिन्दी= कभी न सन्तुष्ट होनेवाले काम का आश्रय लेकर तथा गर्व के मद एवं मिथ्या प्रतिष्ठा में डूबे हुए आसुरी लोग इस तरह मोहग्रस्त होकर सदैव क्षणभंगुर वस्तुओं के द्वारा अपवित्र कर्म का व्रत लिए रहते हैं। उनका विश्वास है कि इन्द्रियों की तुष्टि ही मानव सभ्यता की मूल आवश्यकता है। इस प्रकार मरणकाल तक उन्हें अपार चिन्ता होती रहती है। वे अनेकों इच्छाओं के जाल में बंध कर तथा काम और क्रोध के वशीभूत होकर इन्द्रिय तृप्ति के लिए अवैध ढंग से धनसंग्रह करते रहते हैं।
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदिन्वितिः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्।।१७।।
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका।।१८।।
तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।१९।।
कुमाऊँनी:
आपुकैं ठुल् और ज्ञानी मनणवाल् ,घमंडी, सम्पत्ति और झुटि प्रतिष्ठा में मोहग्रस्त लोग विधि-विधानक् पालन न करते हुए द्यखणाक् ल्हिजी कभ्भीं-कभ्भीं यज्ञ अनुष्ठान आदि लै नाम कमूणाक् ल्हिजी करनीं। झुट अहंकार, ताकत् , डाह, और काम-क्रोध क् वशीभूत आसुरी स्वभाव वाल् मनखि अपंण या औरौंक् शरीर में स्थित भगवान् कैं लै ईर्ष्या और द्वेषैकि नजरैल् द्यखों और अपणैं धर्मैंकि निन्दा करूं। यस् नराधमूं कैं मैं उरातार निम्न योनियों में भव सागर में डावनैं रनूं ।
(अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि- जो घमंडी छन् ईर्ष्यालु, दंभी, पाखंडी छन् यस् आसुरी स्वभाव वाल् मनखि धर्म और भगवान् ज्यु कि निन्दा करनी , ऊं क्वे विधि-विधान कैं न मानते हुए नाम कमूंणक् ल्हिजी यज्ञ, दान आदि लै करनीं और आपूं कैं ई भगवान् या महागुरु घोषित करि दिनीं सिद्-साद् लोग उनार् चक्कर में फंसनै रूनीं और उनर् कारबार् खूब चलंण भै जां। पर भगवान् ज्यु कुनई कि-यस् मनखि उरातार पाप योनियों में जन्मनैं रूनीं और कभ्भीं लै भव सागर पार नि है सकन्।)
हिन्दी= अपने को श्रेष्ठ मानने वाले तथा सदैव घमण्ड करनेवाले, सम्पत्ति तथा मिथ्या प्रतिष्ठा से मोहग्रस्त लोग किसी विधि-विधान का पालन न करते हुए कभी-कभी नाममात्र के लिये बड़े गर्व के साथ यज्ञादि अनुष्ठान भी कर देते हैं। मिथ्या अहंकार, बल, दर्प, काम तथा क्रोध से मोहित होकर आसुरी व्यक्ति अपने तथा अन्यों के शरीर में स्थित भगवान् से ईर्ष्या और धर्मं की निन्दा करने लगते हैं। जो लोग ईर्ष्यालु तथा क्रूर हैं और नराधम हैं, उन्हें मैं निरंतर विभिन्न आसुरी योनियों में, भव सागर में डालता हूं।
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्।।२०।।
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।२१।।
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्तो याति परां गतिम्।।२२।।
कुमाऊँनी:
हे कुन्तीपुत्र! आसुरी योनि में बारम्बार जनम ल्हिनैं-ल्हिनैं आसुरी स्वभाव वाल् मनखि मि तक पुजि नि सकन् बल्कि और लै अधम योनि प्राप्त करूँ। भगवान् ज्यु कुनई कि यौ नरकक् तीन द्वार छन्- काम, क्रोध और लोभ। बुद्धिमान मनखि कैं चैं कि इनूं है बचि बेर् रओ किलैकि इनूल् आत्माक् पतन हूँ। जो मनखि इनूं है बचि जां ऊ आत्मा क् साक्षात्कार करंण वास्ते शास्त्र सम्मत कल्याणकारी करम करूँ और धीरे धीरे ई सई परम गति प्राप्त करूँ।
(अर्थात् आसुरी सोच मनखिक् ल्हिजी भलि न्हां, भौत्तै पुण्यकर्मूं क् फल स्वरूप या भगवान् ज्यु कि असीम किरपा क् कारण यौ मनखि जून मिलीं। तब मनखी कैं यौ जीवन काम, क्रोध और लोभ में नि गवांण चैन् किलैकि यौं तीनैं गुण नरकद्वार बतै रयीं, और सांचि बलाण, परोपकार करंण, पुरखों द्वारा निर्धारित रस्त् पर चलण और सुख-दुःख में समाजौक् दगड़ करंण यौं ई भल् रस्त छन् । आत्म निरीक्षण सब्बूं है भल् उपाय छू, जब हम अपंण भित्येर द्येखनूं त् हम अपंणि बुराइयों कैं दूर करणैं कि प्रयास करनूं और यौ प्रयास भगवान् ज्यु कैं भल् लागूं।)
हिन्दी= हे कुन्तीपुत्र! ऐसे व्यक्ति आसुरी योनि में बारम्बार जन्म लेते हुए भी, कभी मुझ तक नहीं पहुंच पाते। वे धीरे-धीरे और भी अधम गति को प्राप्त होते हैं । इस नरक के तीन द्वार हैं- काम, क्रोध और लोभ। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को इनसे बचना चाहिए, क्योंकि इनसे आत्मा का पतन होता है। जो व्यक्ति इन तीनों द्वारों से बच जाता है, वह आत्म-साक्षात्कार के लिए विधि सम्मत कल्याणकारी कार्य करता है और इस प्रकार शनैः शनैः परम गति को प्राप्त करता है।
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।२३।।
तस्मात्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।।२४।।
कुमाऊँनी:
जो शास्त्रों कि बात नि मानन और अपंणि मनैकि चलौंनी, यस् मनखि न त् सिद्धि पै सकन्, न सुख पै सकन् और न अपंण परलोक सुधारि सकन् । मनखि कैं शास्त्रों क् विधि अनुसार कर्म और कर्तव्य क् पालन करंण चैं, और यौ ज्याणण् जरूरी छू कि शास्त्रीय विधान क्ये छू। तब्बै मनखि अपंण यौ लोक और परलोक सुधारि सकूँ।
(अर्थात् समाजौक् विघटन या पतनक् मुख्य कारण यौ ई छू कि हम द्वी आंखर पड़ि बेर् विद्वान् है जनूं और फिरि अपंण धर्म या भगवान् कैं लै आपूं है नान् समजि ल्यिनू , और हमर् शास्त्रन् में जो वधि-विधान ल्यखी छन् ऊनूं है विपरीत चलंण में अपणि शान समजनूं । हम श्रीराम या श्रीकृष्ण पर लै लान्छन लगै द्यिनूं , हम माता सीता और सती द्रौपदी कैं लै कलंकित करि द्यिनूं, हम ब्रह्मा और सरस्वती पर लै अनाप-सनाप कै द्यिनूं । तब यस् में हमर् भल्याम् कसिक् हौल् । भगवान ज्यु कुनई कि जो मनखि शास्त्र सम्मत कल्याणकारी आदेशूं कैं नि मानन/ समजन् ऊं न त् सिद्धि पै सकन्, न सुख पै सकन् और यस् मनखि अपंण यौ लोक् त् खराब करी द्यिनीं, उनर् परलोक लै खराब है जां।)
🌹आपूं सब्बै स्नेहीजनों क् सहयोगैल् श्रीमद्भगवद्गीता ज्यु क् यौ सोलूं अध्याय पुरी गो।
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
🌹🌿⚘🌺⚘🌹🌿
स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
0 टिप्पणियाँ