
भल् जै के हूँ पै?
रचनाकार: हीरा बल्लभ पाठक
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सौंण-भादोकि रूड़ पूषक् द्यो
चैतक् कार्हूं (ओले) बैसाख में ह्यूं
भल् जै के हूँ पै?
बाप अत्तरी, च्यल् नशेड़ी
सैंणि हरदम बिमारै रूंणी
भल् जै के हूँ पै?
अन्यारपट्टै रसोइ
तामा भनम् घ्यूं और
पितवै भनम् झोइ
भल् जै के हूँ पै?
इक्वाड़ बल्द, टुटी हौव
खेतम् कुरी बुज
नान्तिन् परदेश
बुड़-बाड़ि उदेखम्
भल् जै के हूँ पै?
कांसक् फूटी भान्
द्याप्तक् उजड़ी थान
भ्योव पारिक् मकान
और उधारैकि दुकान
भल् जै के हूँ पै?
द्वी दिनैंकि जिन्नगी
प्रेमैंल् रूंण चैं
ओंतर्याट् फोंतर्याट
भल् जै के हूँ पै?
अहो दाज्यु! तुमत् सिद्द मैंस भ्या
बिल्कुल द्यप्त् जस्
म्यर् चारि उजड्ड और सनकी
भल् जै के हूँ पै?
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हीरावल्लभ पाठक (निर्मल), 13/15-07-2020
स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर,रामनगर
हीरा बल्लभ पाठक जी द्वारा फेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी पर पोस्ट
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