
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
बारूं अध्याय - श्लोक (१ बटि १० तक)
अर्जुन उवाच-
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः।।१।।
श्रीभगवानुवाच-
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।२।।
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ।।३।।
सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहितेरताः।।४।।
कुमाऊँनी:
अर्जुनैल् पुछौ- जो हर समय तुमरि सेवा में तत्पर रूनीं, या जो अव्यक्त निर्विशेष ब्रह्मैंकि पुज करनीं इनूमें कौ ठुल् सिद्ध कयी जां? तब भगवान् ज्यु कुनई कि- जो अपंण मन कैं म्यर् साकार रूप में एकाग्र करिबेर् और श्रद्धापूर्वक मेरि सेवा में लागी रूनीं मैं उनूकैं लै सिद्ध माननूं। लेकिन जो अपणि इन्द्रियों कैं वश में करिबेर् सब जीवों प्रति समभाव धरते हुए , ऊ निराकार ब्रह्मैंकि सेवा करनीं जो (इन्द्रियों कि अनुभूति है परे छू, सर्वव्यापी छू, अकल्पनीय छू, अपरिवर्तनीय छू, और अचल तथा ध्रुव छू)। यस् भक्त सब लोगनैकि सेवा में तत्पर रूनीं और आखिर में मिकैंणि प्राप्त करनीं।
(अर्थात् चाहे साकार ब्रह्मैंकि पुज करौं या निराकारैकि अन्तर के लै न्हां, बस जो लै करंछा ऊ तन, मन समर्पित हुंण चैं। ऊ ब्रह्म कैं क्वे क्ये दि सकूँ जैल् यौ संसारैकि रचना करी, और पालन या संहारैकि (संतुलन करणैकि) जिम्मेवारी लै ल्हि रै? वश तन और मन वीकैं समर्पित करौं, अपण अहम् और वहम् सब एक तरफ्यां धरण पडूं, भगवान् त् श्रद्धापूर्वक भजन सुणिबेर लै प्रसन्न है जानेर् भ्या।)
हिन्दी= अर्जुन ने पूछा- जो आपकी सेवा में सदैव तत्पर रहते हैं, या जो अव्यक्त निर्विशेष ब्रह्म की पूजा करते हैं, इन दोनों में किसे पूर्ण सिद्ध माना जाय? भगवान् ने कहा- जो जो लोग अपने मन को मेरे साकार रूप में एकाग्र करते हैं, और अत्यंत श्रद्धापूर्वक मेरी सेवा में लगे रहते हैं, वे मेरे द्वारा परम सिद्ध माने जाते हैं। लेकिन जो लोग अपनी इन्द्रियों को वश में करके तथा प्राणिमात्र के लिये समभाव रखते हुए परम सत्य की निराकार कल्पना के अन्तर्गत उस अव्यक्त की पूजा करते हैं, जो इन्द्रियों की अनुभूति से परे है, सर्वव्यापी है, अकल्पनीय है, अपरिवर्तनीय है और अचल तथा ध्रुव है, वे समस्त लोगों के कल्याण में संलग्न रहकर अन्ततः मुझे ही प्राप्त करते हैं।
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामब्यक्तासक्तचेतषाम्।
अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।५।।
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परा।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते।।६।।
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्।।७।।
कुमाऊँनी:
जनर् मन अव्यक्त और निराकार स्वरूपक् प्रति आसक्त छन्, उनर् ल्हिजी लक्ष्य प्राप्ति जरा कठिन छू या यौ समजौ कि देहधारियों क् ल्हिजी यौ काम भौत्तै दुष्कर छू। जो अपंण सब काम मिकैं अर्पित करिबेर् अविचलित भावैल् मेरि पुज करनीं और अपंण चित्त कैं मिमें स्थिर करते हुए म्यर् ध्यान करनीं, उनर् ल्हिजी हे पार्थ! मैं जनम-मरण रूपी सागर बटि शीघ्र उद्धार करणीं छुं।
(अर्थात् भगवान् ज्यु क् आशय यौ लै है सकूँ कि भौत् ज्याधे आडम्बर नि करिबेर् तुम अपंण चित्त कैं मिमें लगाओ , और ज्ये लै कर्म करंछा मिकैं अर्पित करि बेर् करौं, जब तुमर् कर्म मिकैं अर्पित हौल् तब तुम गलत कर्म करणैकि सोचि लै नि सकनां। तो देहधारी मनखी यौ सरल विधि कैं अपने बेर् भगवान् ज्यु कि कृपा प्राप्त करि सकूँ।)
हिन्दी= जिन लोगों के मन परमेश्वर के अव्यक्त, निराकार स्वरूप के प्रति आसक्त हैं, उनके लिए प्रगति कर पाना अत्यन्त कष्टप्रद है। देहधारियों के लिये उस क्षेत्र में सफल होना अत्यन्त दुष्कर होता है। जो अपने सारे कार्यों को मुझमें अर्पित करके अविचलित भाव से मेरी भक्ति करते हुए पूजा करते हैं और अपने चित्त को मुझपर स्थिर करके निरन्तर मेरा ध्यान करते हैं, उनके लिए हे पार्थ! मैं जन्म- मृत्यु के सागर से उद्धार करनेवाला हूँ।
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत उर्ध्वं न संशय ।।८।।
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।।९।।
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि।।१०।।
कुमाऊँनी:
तुम भगवान् में अपंण चित्त कैं स्थिर करौं और सारी बुद्धि कैं मि में लगाओ, तब तुम सदैव मि में वास करला। हे अर्जुन! यदि तुम अपंण चित्त कैं अविचल भावैल् मि में स्थिर नि करि सकनां त् भक्तियोगक् सहार लियो और मिकैं प्राप्त करणैकि चाह पैद् करौ। यदि यस् लै नि करि सकनां त् तुम म्यर् ल्हिजी कर्म करौ। किलैकि म्यर् ल्हिजी कर्म करंण पार् तुम पूर्ण सिद्धि कैं प्राप्त करि सकंछा।
(अर्थात् पैली त् जप,तप योगादि विधि जो वेद या शास्त्रों में बता रै वीक् पालन करौं, या फिरि अपंण चित्त कैं मि में स्थिर करौ, यस् लै नि करि सकनां त् भक्ति करौ, यौ लै नि है सकन् त् तुम अपंण सब कर्मन् कैं मिकैं अर्पित करि दियो। यौ प्रकारैल् लै तुम सिद्धि प्राप्त करि सकंछा। पर चाह पैद् करौं त् सही तुम एक पग मेरि उज्याणि बढ़ला त् मि हजार पग तुमरि तरफ औंल्।)
हिन्दी= मुझ भगवान् में अपने चित्त को स्थिर करो और अपनी सारी बुद्धि मुझमें लगाओ, तुम सदैव मुझमें वास करोगे। हे अर्जुन! यदि तुम अपने चित्त को अविचल भाव से मुझमें स्थिर नहीं कर सकते, तो तुम भक्तियोग के विधि-विधानों का पालन करो, इस प्रकार तुम मुझे प्राप्त करने की चाह उत्पन्न करो। यदि तुम भक्तियोग के विधानों का भी अभ्यास नहीं कर सकते, तो मेरे लिये कर्म करने का प्रयास करो, क्योंकि मेरे लिये कर्म करने से तुम पूर्ण सिद्धि को प्राप्त होगे।
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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