
-:अणकस्सी माया:-
लेखिका: रेखा उप्रेती
“नानतिनो!! उठो धं! देबकी इज मर गे|” काखी’ल हमरि रजें उचेड़ बेर पलिकै खेड़ दि। “रात्तै-रात्तै किलै झूटि बलाणें छै काखी..” दिसाण में मुख लुकै बेर हमूल कॉय| हमरि बाल-बुद्धि जाणनेर भई … के नि हुन देबकि इज कं।
पै ठुल मैंस हमरि बात कं ल्याख नि लगूनेर भाय| पूर्र गौं चा’ई भय …क दिन मरें देबकि इज..। न न .. के दुश्मणी जै के भई उनुं दगड़ी| बात इदु’क भई कि पिछाड़ि चार-पाँच दिन बटिक उनार पराण अटकि भाय और गौं वालां काम-काज…। लखनौ बटि भुबन’का आई भाय, पुज-पाठ करून कबेर। आ’ब इंतजाम करूँ.., नि करूँ.., कबेर सोच में पड़ि भा’य। कै’क नातिणिक पासिणी हुणी भइ, कै’के चेलिक दुर्गुण …. और असाड़क म्हैंण लागि भौ’य।सब्बून’कि रोपाइ लै अटकि भ’यि …..।
तबै त सब चा’इ भा’य …, बुड़ि आब मरैंछ तब…!!
हम लै रूढ़’क छुट्टि में घर आई भा’य और साल त बाब्जी हमुन कं छोड़ि बेर वापिस न्ह जानेर भाय .. पै यो साल उ लै अटकि ग्याय। आब मरण मैंस कं छोड़ि बेर कसी जाईंनेर भ’य …। मरणि वालक च्यल लै घर नि पूजि भ’य ।उसी क्यै पहाड़ में मैंस कां भा’य!! मरि कं समसान लिजाहूँ चार कान लै नि मिलनेर भा’य कौS…।
उ दिन त सब्बूं के बिस्वास ह गोय कि आज’कि रात काटण मुश्किले छू…। ‘एकली ब्वारि कसी करैलि…,’ सोचि बेर और-पौर’क आमा, जेड़जा सब्ब उनार घर पूजि ग्याय। हमर बाब्जी त आपण धोति-अंगोछ लै धर ली ग्याय…।रत्तै समसान जाण हौल त वईं बटिक गाड़ में नाण हूँ ठिक रौल..। देबकि इज’कि देराणि लै पुज गेयि… उसी त द्विनूंक अ’बला भौ’य जनम भर …, पै मरणि मैंस दगड़ के दुसमण्याट…!!
रात भर चुलपन चहा’क कितेलि धरि बेर, सब इथां-उथां’क कथ-कहानि में ला’ग रा’य…। रात कसी काटिनेर भइ नंतर…कैं सब्बूं कं झपुक लाग ग्येई और पराण निकल गोय फिर…!! देराणि’ल ब्वारि हूँ कबे’र सासुक बक्स लै खुलवै दि…। सुनक टुकुड़ लै त चैने’र भौ’य पै…, मरणि’य मुख में खितण हुण। गंगाजल, तुलसी पात…, सब्बै इंतजाम करि हाल… बस पराण निकलणे’कि देर छू…।
आइ एक इंतजाम हमरि काखि’ल लै करि भौय …। दिनैं में आपण हलियक घर बटी गोरुक बाछड़ खोलि बेर देबकी इजा’क आँगण में बा’द दी। आपण बक्स बटि डबल निकाल बेर वीक हाथ में धरि आई भई। भल-नक् काम में डबल को देखं … देबकि इज’क च्यल अ जालौ त दि द्य’ल…। उ बाछ्ड़क परताप योस निकल छौS… कि देइ में आइ यमराज लै घबर’ गोंइ…। रातब्याण हूँण तक देबकि इज’ल आँख खोल दि…।
आब देराणिक गाव-गाव…. “रात हूँ तनर बक्स खुलवाई भौय मील…। तनूल देखि हुनल त म्यर छव झाड़न कर द्याल….।” देराणि त भलि किस्मत वालि निकली… पै हमरि काखि’क के भौ’य… के बतुं …..!! द्वी दिन बाद आँगण में बाछ बादि देख बेर बुड़िय’क ख्वर रिट गोई…। “ तो बाछ कैक छू…” पुछि बैठि आपण नाति हुन…। “आमा, त्यार गोदान’क लिजी ऐ रौ ..” नातिल साच्ची बात कै दी।
“तुमार ख्वर रात पड़ जो… अल्ल खोल बे हकाओ तकं …” बुडियल क दि। फिर कैक हिम्मत हुनेर भई उनर सामणी बलाण’की …। आब बाछ कं हलिया याँ लिगेया जब’त वी’क स्यैणि’ल क’दि “तौ गोदान’क बाछ हम नि बादन आब..।” ह’गोय.. आब बाछ’क क्वे ग्वाव-गुंसै नि भ’य त ऊ न्ह गोय उज्याड़ खाहूँ…। जे ख्यात में गोय उक‘लै समझ न आय कि गा’य ककुं ठोकुं …।
हमरी काखि’क अलग आफ़त… आ’म कुनेर भई “ तू हूँ कैल कौछ, पराई गाय में गोदान करहूँ…”
आब गोदान’क बाछ कं को बादनेर भौ’य आपण गोठ… सब्ब सोचने’र भा’इ – कैं हमुकैं वैतरणी पार न कर दियो…!
रेखा उप्रेती, 23-06-2020

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