
लोकतंत्रै कि यात्रा में पहाड़ कि पीड़...
(रचनाकार: दिनेश कांडपाल)
(रचनाकार: दिनेश कांडपाल)
यौं मुख बगिया राय
ऊंठ सुकियै राय
ग्वरां क राज ग यो
सुकिल कपड़ि आय।
ख्वरां में टोपि साजि
द्वि बल्दूं कि जोड़ि भाजि
जवाहर कटै टरफर में
गौं गाड़ूं में आस जागि।
चमचमाट देखनैं आया
कांस सांटि बे स्टील ल्याया
सिलफरक भानूंल जसि
तौल कस्यार खाया।
हम लै पड़ा फैंलां
बाघ बकार दगणैं रैंला
गौनूं क भाग जागिंल
चुपड़ी र्वाट मनखि खैंला।
गांधि क सब ठगनै आय
कस कसा स्वांग दिखाय
गौंनू कं स्वैंण दिखै
शहर ठुल ठुल बसाय।
अज़बै बख़्त आय
ज्वतां लै टापि कैं खाय
पहाड़ डाड़ हालनी
भाबर में बहि रै माय।
भाबर का भाग जागा
मनखी सब उथैं भाजा
ठेकि धिनाइ गयी
दूध क पैकेट छाजा।
खेति सब बंजै हालि
पुश्त आघिल के खालि
ठुल ठुला कोठी छाजा
रोटि कथां बै आलि।
च्यला तब कहाँ जाला
आपुंण कपाव खाला
कागज क रुपैं ल्यैबे
रुपैं कतू बुकाला।
ठुल ठुल औफिस बन
फैक्ट्री बज़ारौं कि रंन
कां कां बै मनखि आया
घरु पन चुणमंन।
एक दिन तू लै च्याला
भूड़ भाबर जाला
गाव् में कुथाव डालि
द्वी र्वाट कमै खाला।
मकान निसासी रौल
पटांगंण कथैं कौल
उखऊं क खुलि गिच
रोज बुजियै रौल।

@दिनेश कांडपाल, 17-11-2017
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