वकतौ फेर

आब यो ले वक्ते छ, ठुला ठुला मकानों में, ईजा बाज्यू और पूणा खिन, जागा ना हुन नई। Kumaoni Poem about disparities in lifestyle with time

वकतौ फेर
रचनाकार: राजू पाण्डेय

उले वक्ते छयो
ऐके कमरा में
पूरो परिवार और
पूणा ले देला फैला है रुंछि
उयी में गौ वाला को
उण जाणो ले लागी रुंछि

गोठ गऊ बाछा
पाड़ा में सब रुंछि
भाड़ कोरगा में
अनाज दगड़ी मूसा
चूला थे आग ला
बिरालु सी रुंछि
काखि, ईजा चूला भाड़ी में
बूबू किस्सा कहानी कुंछि

आधा दर्जन नंतिना आमा
एकली पालि जांछि
काखि ले दूध पेवा जाछि
जब ईजा गड़ा भिड़ा हुंछि
एक नांनानो कमरों
राजमहल झ लाग रुंछि।

आब यो ले वक्ते छ
सबो का अलग अलग
कमरा है गई
ठुला ठुला मकानों में
ईजा बाज्यू और पूणा खिन
जागा ना हुन नई

एक्ठठो परिवार, रिश्तेदारी
आमा, बूबू, काका काखि
मालकोटे की खीर चाखि
किताबों में बस
पढ़ूँन खिन रे गई।।

शब्दार्थ:
उले वक्ते छयो - वो भी समय था
पूणा - मेहमान। देला फैला - खुले खुले
पाड़ा - पहली मंजिल। कोरगा - अनाज रखने का बांस का बना बड़ा बर्तन। मूसा - चूहे। दगड़ी - साथ।
सी - सोना। काखि - चाची। चूला भाड़ी - चूल्हा चौकी।
नांनानो - बहुत छोटा।

~राजू पाण्डेय, 14-05-2019
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