
मनखी तू मनखी नि हनै क्या हनै
रचनाकार: रमेश हितैषी
मनखी तू मनखी नि हनै क्या हनै,
मनखी तू मनखी नि हनै क्या हनै,
क्या पत्त ढुंग हनै,
तोड़ियनै फ़ोडियनै छैनी हतोड़ियुल कोरियनै।
चार कुण चौकस कैबै सिध कई जानै,
कैक न कैक दिवाल परि छाजी रहनै।
बुसिलु हैनै राडु हनै गंगळवाडु या रिवाड़ी,
कैक गमलू मै हनै कथैं थान में ह्नै,
कैक उखोउ, सिल्वट, कैक घट्ट हनै.
कैक न कैक पाग्यारिक सै में हनै।
ढुंग नि हनै पेड़ हनै, पतव, म्वटु, लंगलंगु, सपसपु,
कैक भराणु, सतीर, देहे या दादर हनै।
अमोर्या हनै, फूटनी नि हनै,
कैकि चुल्याणी कैकि सगड़, जगि बै काकै हाव् दिनै।
पेड़ नि हनै फूल हनै,
कैकि मावा, गुलदस्ता, कैक ख्वारम् गजरा हनै।
फै हनै, मेहेव हनै, किलम्वाड़ चै घिंगारु हनै,
मंदिर मे चढ़ाई नि जानै सार्यों में खिली रहनै।
फूल नि हनै फल हनै,
लिह्मु, नारंगी, माल्टा, जम्हीर या अठनि हनै।
मिठू हनै, खट्टु हनै, घतघतु या या टसुटसु हनै,
कैक जिकुड़ी तर कनै
जाकै नि मिळुनु वकि हिकोईम रिटी रहनै।
क्ये काम नि आनै ना सही,
बीस लागी बकरुक गौ हन तरकई जानै।
फल नि हनै माटु हनै
लाल, काउ या रतवाड़ी भसभसु हनै।
कैक मरी ज्यून में काम आनै,
कैक न कैक पाथरु परी ज्येड़ी रहनै।
बगि जाने रड़ी जानै,
कखरी या ताई जानै, कैकी न कैकि जड़ जमानै।
माटु नि बांस हनै, गध्यर हनै,
धार में स्योहन या गजार हनै,
कैकि डाली, सुपि, थोई, चिलम, मुरुली, कलम हनै।
क्ये नि बनि सकनै
आखिरी समय में सीढ़ी त बानी जानै।
पर तू सोच यौ सब नि हनै त क्या हनै,
जसु छै वसै हनै दौड़ते रहनै, सोचते रहनै।
मनुष्य है बै मनुष्यक गुलामी कनै,
अपण पर्या कैं जरूर भूलि जानै।
जरासै लै सिखि लिनै एक से कुछ,
कुछ न कुछ त जरूर कै जानै,
भल कर्मुल सब याद कई जानी,
तू लै यसै याद कई जानै।
तू लै यसै याद कई जानै।
सर्वाधिकार@सुरक्षित, June 7, 2016

श्री रमेश हितैषी
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