
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
चेली
कब ठुल है जानीं
पत्त नि चलन....
घ्वाग'नां बोट जास
खुरू-खुर
मलिकै ऐ जानी.....
हरियाँ हरी धोति जै
पैर बेरि ....
एक चेलि में
बैंणि
स्यैंणि और
कभै - कभै
इज ले
देखीनेर भये......
घ्वाग'नै चार
पाकी रयी
ख्वार में
"बुर्का" पैरीं......
खेतन में
सबन है भल
मैं कैं
योयी लागौं।
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यतु
उमर खै बेरि
अकल नि ऐ त
भगवान ले
के नि कर सकन...
भागी!
आपण घोल है
भ्यार आली त
ते कैं
चाड़ प्वाथनै'कि
चूँ-चाँ
सुणयैलि और
देयि में पुजी
सूर्ज ले
भतर'कै आलो त
उज्यावै-उज्याव
है जनेर छ...
तेरि दुन्नी में और
मेरि दुन्नी में ले
आब....
यहै बाहिक
के चैन कै हरौछी.....
तदुकै भौत समझ
कि , ढुँङ में रड़ी
बखत में .....
आजि ले
"घाम" ऊँणी छ।
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शब्दार्थ:-
घ्वाग - भुट्टा,
खुरू-खुर - चुपके-चुपके
बुर्का - भुट्टे के बाल
Nov 29, Dec 06 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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