श्रीमद्भगवतगीता - कुमाऊँनी भाषा में अट्ठारूं अध्याय (श्लोक ५७ - ६९)

कुमाऊँनी भाषा में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्, interpretation of ShrimadBhagvatGita in Kumauni Language

कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्

 अट्ठारूं अध्याय - श्लोक ( बटि ६९ तक)

चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तं सततं भव।।५७।। मच्चित्तं सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि। अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रेष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।। यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति।।५९।। सावभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्।।६०।। कुमाऊँनी:तुम सब कामों क् ल्हिजी मी पार् निर्भर राओ और म्यर् संरक्षण में सदैव कर्म करौ ऐसि भक्ति में सदैव चेतन राओ। यदि तुम म्यर् दगड़ जुड़ी रौला त् मेरि किरपाल् तुम यौ मरणशील् जीवनांक् सार्रै अवरोधों कैं पार् करि जाला। यदि अहंकार वश ऐसि चेतना में कर्म नि करला और म्यर् बताई बाट् पार् नि चलला त् विनष्ट है जाला। हे अर्जुन! म्यर् निर्देशानुसार यदि तुम कर्म (युद्ध) नि करला त् तुम कुमार्ग क् तरुब जाला, पर स्वभाव वश यौ काम करणैं पड़ौल्। यौ बखत् तुम मोहवश मेरि आज्ञा मानणां ल्हिजी मना करनंछा परन्तु तुमर् जो स्वभाव छू वीक् आधार पर तुमूंकैं यौ कर्म (युद्ध) करणैं पड़ौल्। (अर्थात् जैक् जस् स्वभाव हूँ ऊ अपंण ऊ स्वभाव क् अनुसार कर्म जरूर करौं पर भगवान् ज्यु निर्देश करनयीं कि तुम जो लै कर्म करंछा करौं पर ऊ कर्म कैं मिकैं अर्पित करि बेर् करौ। तो मित्रो! जब हम अपंण कर्म भगवान् ज्यु कैं अर्पण करूल् त् खराब कर्म करंणल्हिजी हमर् मन आज्ञा नि द्यओ, किलैकि खराब कर्म हमेशा पर्दाक् पिछाड़ि( लुकि-छिपि) बै करी जनीं। तब भगवान् ज्यु क् सामणी हम जो लै करूल् भलै-भल् करूल्।)

हिन्दी= सारे कार्यों के लिये मुझपर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो, ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो। यदि तुम मुझसे जुड़े रहोगे तो, मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के अवरोधों को लांघ जाओगे। लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकार वश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरे संदेश को नहीं समझोगे तो विनष्ट हो जाओगे। हे अर्जुन! यदि तुम मेरे निर्देशानुसार कर्म (युद्ध) नहीं करते तो तुम कुमार्ग पर जाओगे, इसलिए तुम्हें अपने स्वभाव वश यह कर्म (युद्ध) करना ही होगा। इस समय तुम मोहवश मेरे निर्देशानुसार कर्म करने से मना कर रहे हो, किन्तु तुम अपने स्वभाव से उत्पन्न कर्म द्वारा बाध्य होकर वही सब करोगे।

ईश्वरः  सर्वभूतानां  हृद्देशेऽर्जुन  तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानां यन्त्रारूढानि मायया।।६१।।
तमेव  शरणं  गच्छ  सर्वभावेन  भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शास्वतम्।।६२।। 
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु।।६३।।
सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्।।६४।।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे।।६५।। 

कुमाऊँनी:
हे अर्जुन! परमेश्वर हरेक जीव में छू, और भौतिक शक्ति द्वारा बनाई हुई यन्त्र में सवार कि चार सब्बै जीवों कैं अपंणि माया द्वारा भरमांण लै रौ।  येक् वास्ते तुम वीकि शरण में जाओ। वीकि किरपाल् तुमूंकैं शान्ति लै मिलैलि और नित्य धाम लै प्राप्त हौल्।  यौ प्रकारैल् मील् तुमूंकैं गुप्त ज्ञान बतै है, आब् तुम ये पार् मनन करौ तब ज्ये चांछा उस् करौ। तुम म्यर् परम मित्र छा, मीं तुमूंकैं अपंण आदेश (जो भौत्तै गुप्त छू) बतूंनयू,  ध्यानैल् सुणौ।  सदैव म्यर् चिन्तन करौ, म्यर् भक्त बणौ, मेरि पुज करौ, और मिकैं नमस्कार करौ तो निश्चित रूपैल् तुम म्यर् पास ऐ जाला, यस् मीं तुमूंकैं वचन द्यूनूं।
(अर्थात्  सब जीवों के भगवान् अपंणि माया द्वारा भरमानी,  आब जो भगवान् ज्यु क् भक्त छू और हर समय,  हर जाग् पार्, हर स्थिति में भगवान् ज्यु क् स्मरण करूँ,  वीक् सामणी माया लै नि ठैरि सकनि।  भगवान् ज्यु कि शरण हुंण पार् मनखिक् यौ लोक् और परलोक् सुधरि जनीं, पर भगवान् ज्यु कि शरणागति क् व्रत लियो त् सई।  जो भक्तोंल् शरण करी उनूं में नरसी भगत, मीराबाई,  सूरदास, भक्त प्रह्लाद,  हनुमान,  शबरी, केवट, रैदास आदि भक्त छन्।  जनूल् भगवान् ज्यु क् साक्षात्कार करौ।)

हिन्दी= हे अर्जुन! परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित है और भौतिक शक्ति से निर्मित यन्त्र में सवार की भांति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से भरमा  रहे हैं।  इसलिए सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ, उसकी कृपा से तुम परम शान्ति तथा परमधाम को प्राप्त करोगे। इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्यतर ज्ञान बता दिया, इस पर पूरी तरह से मनन करौ तब जो चाहे करो।  चूंकि तुम मेरे प्रिय मित्र हो, अतएव मैं तुम्हें अपना आदेश जो सर्वाधिक गुह्यज्ञान है, बता रहा हूँ,  इसे अपने हित के लिए सुनो। सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, और मुझे नमस्कार करो इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे।  मैं  तुम्हें वचन देता हूँ,  क्योंकि तुम मेरे परम मित्र हो।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिस्यामि मा शुचः।।६६।।
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।६७।।
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः।।६८।।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुविः।।६९।।

कुमाऊँनी:
भगवान् ज्यु कुनई कि,  तुम सब प्रकारक् धर्म कैं छोड़ि बेर् मेरि शरण में आओ, मीं तुमूंकैं सब्बै पापन् है मुक्त करि द्यूल् । परन्तु यौ जो गुप्त ज्ञान छू यैकैं, जो संयमी न्हां, जो एकनिष्ठ या मेरि भक्ति में रत न्हां, और जो मिकैं द्येखि बेर् बैर करूँ यस्  मनखि कैं कभ्भीं झन् बतैया, लेकिन जो म्यर् भक्तों कैं म्यर् यौ रहस्य बताल् ऊ मेरि शुद्ध भक्ति कैं प्राप्त करिबेर् म्यर् नित्य धाम कैं अवश्य प्राप्त करौल्।
(अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि, तुम धर्मेंकि बात छोड़ो (किलैकि धर्म पार् चलंण सरल काम न्हां और कलजुग में त् बिल्कुलै सरल न्हां) बस तुम मेरि शरण में ऐ जाओ, डरो नैं मीं तुमर् उद्धार करि द्यूल्।  यौ गुप्त ज्ञान छू सिर्फ जो भगवान् ज्यु क् भक्त छीं उनरै ल्हिजी छू दुहराक् समज में नि आवो यैक् ल्हिजी जो भगवान् ज्यु में आस्था धरनीं ऊं यौ रहस्य कैं समजि सकनीं और लाभ लै प्राप्त करि सकनीं।)

हिन्दी= तुम समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ।  डरो मत, मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूंगा।  यह गुह्यज्ञान उनको कभी न बताना जो संयमी नहीं हैं, जो एकनिष्ठ और भक्ति में रत नहीं हैं, और जो मुझसे द्वेष करते हैं।  किन्तु जो मेरे भक्तों को यह परम रहस्य बतायेगा, वह मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त करेगा तथा मेरे धाम जो नित्य है को प्राप्त करेगा।  इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे अधिक प्रिय है, और न कभी होगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार

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