श्रीमद्भगवतगीता - कुमाऊँनी भाषा में सत्रहूं अध्याय (श्लोक ०९ - १६)

कुमाऊँनी भाषा में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्, interpretation of ShrimadBhagvatGita in Kumauni Language

कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्

 सत्रहूं अध्याय - श्लोक (०९ बटि १६ तक)

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरुक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदा।।९।। यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्।।१०।। अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदिष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्विकः।।११।। अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ।।१२।। कुमाऊँनी:अमिल, नमकीन, गरम, चटपट, क्वर और जलन पैद् करणीं भोजन रजोगुणी लोगन् कैं भल् लागूं, यस् भोजन दुःख, शोक और रोग पैद् करूँ। तीन-चार घंट पैली पकायी, बेस्वाद, सड़ी हुई, जुठ भोजन तामसी लोगन् कैं भल् लागूं। यज्ञ लै वी सात्विकी कयी जां जो शास्त्रानुसार और कर्तव्य समजि बेर् और फलैकि इच्छा बगैर करी जां। जो यज्ञ अपंण लाभ या अभिमान वश करी जां ऊ यज्ञ लै राजसी कयी जां। (अर्थात् भोजनक् महत्व शरीर कैं पुष्ट करंण छू, और हमर् बुजुर्गों क् कूंण लो छु कि " जैसा खावे अन्न, वैसी उपजै बुद्धि" तो भगवान् ज्यु लै कुनई कि खट्ट, नमकीन, भौत् गरम, चटपट, क्वर (खुसक) और जलन पैद् करणीं भोजन नि करंण चैन् यस् भोजन दुःख, शोक और रोग पैद् करनीं। बासि, सड़ी हुयी, जुठ और जै में स्वादै नि छू यस् भोजन लै नि करंण चैन्। और शास्त्र सम्मत यज्ञ जो बिना फल प्राप्ति कि इच्छाल् करी जां वी फलदायी हूँ, अभिमान वश या फलप्राप्तिकि ल्हिजी यज्ञ नि करंण चैन्, वीक् क्ये लाभ न्हां।)

हिन्दी= अत्यधिक तिक्त, खट्टे, नमकीन, गरम, चटपटे, शुष्क तथा जलन उत्पन्न करने वाले भोजन रजोगुणी व्यक्तियों को प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन दुःख, रोग तथा शोक उत्पन्न करते हैं । खाने से तीन घंटे पूर्व पकाया गया , स्वादहीन, सड़ा हुआ जूठा तथा अस्पृश्य वस्तुओं से युक्त भोजन तामसी लोगों को प्रिय होता है। यज्ञों में वही यज्ञ सात्विक होता है, जो शास्त्र के निर्देशानुसार कर्तव्य समझ कर , फल की इच्छा किये बिना किया जाता है। जो यज्ञ भौतिक लाभ के लिए, या गर्व वश किया जाता है , उसे राजसी जानो।

विधिहीनमसृष्टान्नं     मन्त्रहीनमदक्षिणम्।
श्रद्धाविरहितं  यज्ञं  तामसं  परिचक्षते।।१३।।
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं     शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप  उच्यते।।१४।।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते।।१५।।
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येत्येतत्तपो मानसमुच्यते।।१६।।

कुमाऊँनी:
जो यज्ञ शास्त्रों क् निर्देशूं कि अवहेलना करि बै, प्रसाद बांटी बगैर, वेदिक मन्त्रों क् उच्चारण करी बगैर, बामण कैं दक्षिणा दियी बगैर और बिना श्रद्धाल् करी जां ऊ तामसी यज्ञ कयी जां । परमात्मा,  बामण, गुरु और माँ-बाप जस् गुरुजनों कि पुज करंण,  पवित्र रूंण,  सरल रूंण,  ब्रह्मचर्य और अहिंसा क् पालन करंण यौं शारीरिक तपस्या क् लक्षण छन् । सांचि बलाण,  जो लोगन् कैं भल् लागीं,  हितकारी, और दुहरै कैं नक् नि लागीं यस् वचन बलाण तथा वैदिक साहित्य क् पाठ करंण यौं सब वाणीकि तपस्या छीं । संतोष, सरलता,  गम्भीरता,  आत्मसंयम और शुद्ध जीवन यौं सब मनै कि तपस्या क् लक्षण छीं ।
(अर्थात् यज्ञादि अनुष्ठान  दम्भ,  पाखण्ड या अभिमान वश नि करण चैन् और शास्त्र विधि अनुसार करंण चैं, दक्षिणा और काम करणियां क् मन नि दुखांण चैन् तब यस् यज्ञ सुफल हूँ । परमात्मा,  गुरु, बामण (पुरोहित) और माँ-बाप जस् गुरुजनों कि सेवा, पवित्रता,  सांचि बलाण,  अपंणि वाणी पर संयम धरण,  सरल और गम्भीर रूंण यौं सब अलग-अलग प्रकारक् तप छन्। टी वी, मोबाइल या सिनेमा द्येखण हैबेर् भलौभल् साहित्य पड़ण चैं और अपंण नान्तिनां कैं लै महामनखियों बार् में बतूंण चैं। जो लै कथावाचक , शिक्षक,  या समाज में गणमान्य लोग छीं यस् लोगों क् दायित्व हूँ कि समाज कैं सई दिशा और सई रस्त पार् आघिल् बड़ाई जाओ। यस् नियम/आचरणों क् पालन करि बेर् मनखि अपंण और दुसरौक् जीवन कैं लै सुखमय बणै सकूँ।)

हिन्दी= जो यज्ञ शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके, प्रसाद वितरण किये बिना, वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना, पुरोहितों को दक्षिणा दिये बिना तथा श्रद्धा के बिना सम्पन्न किया जाता है, उसे तामसी माना जाता है। परमेश्वर, ब्राह्मण, गुरु, माता-पिता जैसे गुरुजनों की पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही शारीरिक तपस्या है।  सच्चे, अच्छे लगनेवाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करनेवाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित पाठ करना यही वाणी की तपस्या है। तथा सन्तोष,  सरलता,  गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन की शुद्धि ये मन की तपस्या है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार

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