
"द्योरन को त्यार"
कुमाऊँनी कविता
रचनाकार: मोहन चन्द्र जोशी
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फूल पयाँ क् अघैल आरू और हाँस जसा गढ़म्होव लै फूला।
सरसों पिङई हरिया स्यारि में और प्योलि मिझोव याँ ढई वाँ ढई।।
ढोलक मजिरा दमुँ-नाँङार बाजा, शिव की स्थली में निशाँण पुजा।
देवी थॉंन पुजा, होई गीत गाजा, अहा कत्यूरैकि होइ रे होई।।
मन में सोचिया साँचि स्वैंण कदु, और मनम कैं देइया गैंण कदु।
नानतिन लै थामा, गोरू-बाछ लै द्यखा, बुढि भौजि भै रै खोकई-खोकई।।
फागुण में कसि य मत्ति भई? होल्यारन की सब गत्त गई।।
द्दलड़ी दिन झुण्ड होल्यारन का, रिसि चार औनी रिङोई-रिङोई।।
द्योर लला कसि लाल हला? कदुकै जुगुता नईं भौजिन की।
कदु डाब् पुराँणा यबटै-यबटै, परकार कदु य छोई, उ द्दोई।।
खिड़की-खिड़की पाँणि-धार पड़ा और ढपाढप द्वार ढकी।
अरड़ा-अरड़ा तर्रैक पड़ा मजाकिल गिज गिङई-गिङई।।
आँख पट्ट बुजा, दाड़ि कट्ट किटी, घुन-च्यौनि लगै हाथ सारनकी।
लफोड़ी लट कच्यारन में, अबीरन में गालड़ी सानिणीं।।
फत्-फत् फतोई, ज्वात गुभर फई, चिरड़ी गव ऑंङ घचोई-घचोई।
ख्वार छार पड़ी, कच्यार फई, मुख द्योरन को बदई-बदई।।
होई भौत देखी रंगत नैं यसी, आब् हाव् के चली पगली-पगली।
काइपट्ट मताङँण नाक ढ्वला, भई लाल कत्ती पिङई-पिङई।।
द्योरन को तो य त्यार भया, मैंसन को नखरा न्यार भया।
नन्दों की होई में भौजी नई-नवेली के कईं के कईं?

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मोहन जोशी, गरुड़, बागेश्वर। 21-03-2016
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