
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
दी जगायि
उज्याव
नि भै.....
के फैद?
...........
अन्यार मैयी
उज्याव'कि ले
आस......
हुनेर भै।
...............
डबल'नलि
उज्याव हुनो त
लछिम......
उल्लू - दगाड़
कभै नि बैठनि।
............
कतुकै
अन्यार है जाऔ
भतेर में
"चिंणुक" रुनेरै भै।
.............
कभै न कभै त
तु जरुर आलै.....
योयी सोचि बेरि
आम'लि.....
"द्वि" जगैयी भै
कल्ज में....।
............
आम्
जैयी बाद
घर में
दिवाई ले
निं जागि कूँछा.....
आब्
बखाई भरी अन्यार'लि
"थार्" बादि राखौ।
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का्व बखत में
घुनटोप लगै बेरि
कि हो्ल कै हरौछै....
क्वा्ड़ बाग जस
लुकि बेरि
त्यार हा्थ शिकार
भले लागि जाऔ मगर
तु खै नि सकै.....
यो पक्क जा्ँण
किलैकि
स्यात थिकावन में
जतु ले ते कैं
सत्तरि या
"पाँच सौ पचीस" मैंस
देखींण लागि रयीं नै....
उन सबन 'क पेट
दाव-भात'लि
भरन न्हाँ...
र्'वाट - साग ले
पचन न्हाँ....
यै वीलि
उँ सब ले
शिकार में लागि रयीं
आ्ब
शिकार त्योर हौओ
या म्योर हौओ
के फर्क पणों, मगर
यो भरौस कर.....
कि जदिन
पेट च्यापि बेरि बैठी मनखी
ठा्ड़ है जा्ल नै
उदिन......
इन शिकारि'न कैं
छीड़ पुजूँणैं लिजी
पाँच मीटर
स्यात कपड़ 'कि ले
जरुवत नि पड़ैलि.......।
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शब्दार्थ:
दी - दिया,
लछिम - लक्ष्मी,
चिंणुक - (चिंगारी) यहाँ जीने की इच्छा से है,
कल्ज - हिया/ दिल,
दिवाई ले नि जागि कूँछा - मतलब कि दीवाली नहीं मनाई गयी।
का्व बखत - खराब समय,
घुनटोप - घुटनों मे सर छुपाना,
क्वाड़ बाग - घात लगा कर शिकार बनाने वाला पहाड़ी बाघ,
स्यात थिकावन - सफेद कपडों में (आशय नेताओं से),
जदिन - जिस दिन,
पेट च्यापी - भूखा प्यासा,
उदिन - उस दिन,
छीड़ - तात्पर्य शमशान से है
Oct 19, 23 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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