पहाड़ा का रत्थ - कुमाऊँनी कविता

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पहाड़ा'का रत्थ

रचनाकार: रेखा उप्रेती

दगड़ियो
आज-भोल
पहाड़ा'का रत्थ लागि रयिँ,
मी त याँ छुँ
सुर कत्थ लागि रयिँ।

बादी रयिँ खुट
मन चमकि रौ,
झिट्ट-झिट्ट में
पूजि जाणौं
आपण गौं।

देई' क खुटकूँण में बैठ
चहा पीण्यूँ,
य सोचि बेर
दाल में
चिनि खित दिण्यूँ।

नान्तिन कू णयिं
ईजा
के हगे बात,
रोज पकै दिछै
चुणकाणि-भात।

स्वैण में देखि णी
गौं'क
बुड़ा-बाड़ि,
आंगण में
आ'म हरै ठाड़ि।

ईजा पयुँ णैँ
दातुल,
ठुल बोजी
माठु माठ
लिपण रै चुल।

काखि'क ख्वार में छू
पाणि'कि गागरि,
नान दिदी
भर ल्यरै
काफल'कि छापरि।

के करूँ
कै हुणि
पूछ कराओ धं,
कै गणतू कं
चावल दिखाओ धं।
(रेखा उप्रेती)

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