कुमाऊँनी भाषा में शेर-शायरी, ज्ञान पंत जी द्वारा  Kumauni Sher-Shayari by Gyan Pant, Kumaoni Shayari

जिम कार्बेट पार्काक् शेर......

रचनाकार: ज्ञान पंत

कुदरत'कि 
माया छ ....
जिन्दगी में ले 
" पहाड़ " हुनेर भये। 
...................
तुम 
निं  सुँणनां नै ....
तबै पहाड़ 
ढुँङ घुरयूँ 'छ। 
............
पहाड़ 'कि 
फसक मे ले 
हमैरि 
ठसक भै। 
...............
साँचि कूँ त 
पहाड़ 'कि बात करण ले 
आब् 
बेमन्टी  जसि लागैं। 
..............
सोचण में
के लागों ....
हरिया - हरीं 
सोची करौ। 
...............
स्वैंण देखण ले 
जरुरी भै .....
जिन्दगी में 
योयी "छिलुक" लूँनेर छन। 
........,,,
त्वीलि 
चोर कौ त 
दुन्यै'लि 
चितचोर के देछ 
मैं .....
के करुँ पैं। 
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पैंलीं 
शेर छी बल 
जिम कार्बेट पार्क में 
अच्छयान.....
स्यावै-स्याव 
भरीं छन। 
.............
बाघ जै 
पिंजाड़ में छन त 
"स्याव'न" जै 
जो पुछों बल। 
....................
पैंली 
बानर भै 
मनखी....
फिर                            
गुणि-बानर भै कूँछा 
मनखिएकि....
विकास यात्रा में ले 
को जाँणौ 
"पटै बिसूँण" जस 
क्याप छ बल। 
...............
बखत'क दगाड़ 
हिटण .....
हाव् दिगा 
उड़ण और 
पाँणि दिगा 
बगण .....
सित्तुल हुनो त 
फिर
को पुच्छी 
बखत कैं।
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शब्दार्थ:
घुरयूँ'छ - लुढकाता है,  
ठसक - मान सम्मान,  
हरिया हरीं - अच्छा-अच्छा,  
स्वैंण - सपने,  
छिलुक - छिलुक (चीड़ की छीलन जो लीसा होने कारण जलने पर मशाल जी जलती है) मानी उजाले से है, 
लूनेर छन - लाने वाले हैं,  
दुन्यै'लि - दुनियाँ ने
स्यावै स्याव - सियार ही सियार, 
गुणि बानर - लंगूर, 
पटै बिसूँण जस - सुस्ताने जैसा,  
सित्तुल - सरल,

Oct 09, 14 2017
...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार