
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
सोलूं अध्याय - श्लोक (०१ बटि १२ तक)
श्री भगवानुवाच -
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञ्यश्च स्वाध्यायास्तप आर्जवम्।।१।।
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।२।।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत।।३।।
कुमाऊँनी:
यौ प्रकारैल् मली लिखी हुई छब्बीस गुण जैक् पास छन् भगवान् ज्यु ऊ कैं देवतुल्य मनखी बतूंणयी।
(आब् सवाल यौ छू कि यतुक् गुण कसिक् प्राप्त करी जै सकनीं? सबन् है पैली हमूं कैं अपंण अहार- व्यौहार में बदलाव करंण पड़ोल् और हमत् जस् लै छू पर हमरि संतान गुणी हौओ येक् ल्हिजी कुकुर-बिराऊ चार संतान पैद नि करंण चैनीं और जो संतान च्येलि या च्यल् छू वीकैं भला-भल संस्कार दींण चैनीं, नैतिक/धार्मिक शिक्षा जरूर दींण चैं, महापुरुषों कि जीवनी पढ़ाण चैं । हमर् धर्मशास्त्रों और धर्मग्रंथों में यतुक् विज्ञान छु कि आजक् विज्ञान विकि बराबरी करी नि सकून्। संस्कारवान मनखि अपंण उद्धार त् करनैं छू, पर समाजौक् लै उद्धार करूं।)
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्।।४।।
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।५।।
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिनद्वैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु।।६।।
कुमाऊँनी:
हे अर्जुन! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान - यौं आसुरी (राक्षसी) स्वभाव वाल् लोगों क् गुण छन् । दिव्य गुण - जो मिल् पैलिकै बतै हैली मोक्षदायक छन् और यौं आसुरी गुण बन्धन कारक छीं। परन्तु तुम चिन्ता नि करौ किलैकि तुमर् जन्म दैवी गुण ल्हि बेर् है रौ। संसार में द्वी प्रकारक् मनखि रूनीं एक दैवी गुण वाल् और दुहर् आसुरी गुण वाल् । दैवी गुणांक बार् में मिल् पैली बतै है, आब आसुरी गुणांक बार में सुणौ।
( अर्थात् दैवी गुण जो मनखि में हुंनी ऊ कैं अपंणि सम्पन्नता, ज्ञान, विद्या और कुल इन सब चीजोक् रत्ति भरि लै गुमान नि हुंन, और ऊ सदाचारी, मृदुभाषी और पर उपकारी हूँ, अपंण आस-पास दुखी व्यक्ति या समाज कैं द्येखि बेर् यस् मनखि द्रवित है जां और ऊ व्यक्ति या समाजौक् दुःख दूर करणक् (कष्ट सहन करि बेर् लै) हर सम्भव प्रयास करूं। जबकि आसुरी स्वभाव वाल् मनखि जो छू ऊ समाज कैं या अन्य लोगन् कैं दुःखी द्येखि बेर् खुशि हों और दुःख दिणौंक् लगातार प्रयास लै करूँ, और यस् लोग स्वयंभू ज्ञानी बणि बेर् आपूं कैं स्थापित करणक्, धर्म गुरु बनणाक् लै प्रयास करनीं और समाज कैं दिग्भ्रमित करि अपंणि पुज करवानी और सब्बै सुविधायुक्त कोठि बंग्यल अपंण ल्हिजी बनानी और डबल कमानी। किसम-किसमक् पंथ या धारा बणै बेर् शास्रों और ग्रन्थों में खामी निकालनी यौ संसार यस् द्वियै प्रकारक् लोगों क् जमघट छू।)
हिन्दी= हे पृथापुत्र! दम्भ, दर्प, अभिमान, क्रोध, कठोरता तथा अज्ञान ये आसुरी स्वभाव वालों के गुण हैं। दिव्य गुण मोक्ष के लिए अनुकूल हैं और आसुरी गुण बन्धन दिलाने के लिए हैं। किन्तु तुम चिन्ता न करो क्योंकि तुम दैवी गुणों से युक्त होकर जन्मे हो। इस संसार में सृजित प्राणी दो प्रकार के हैं - दैवी तथा आसुरी। मैं पहले ही तुम्हें दैवी गुणों के बारे में बता चुका हूँ, अब असुरी गुणों के विषय में सुनो।
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना ना विदुरासुराहः।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।।७।।
असत्यमप्रतिष्ठे ते जगदाहुरनीश्वरम्।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।८।।
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोहिताः।।९।।
कुमाऊँनी:
आसुरी स्वभाव वाल् मनखि यौ ज्याणनें नैं कि क्ये करंण छू और क्ये नि करंण छू। उनूं में न त् पवित्रता हुंनी न भल् आचरण हुंन और न ऊं सांचि बलान्। यस् लोग यौ संसार कैं एक साधारण वस्तु समजनीं और कूनीं कि ये क् क्वे आधार न्हां, क्वे भगवान् यौ संसार कैं नि चलान् , यौ त् मैथुनी सृष्टि छु जो स्त्री और पुरुष (नर-मादा) क् संजोगैल् बणीं, फिरि यस् तर्कोंक् अधार पर ऊं अपंण विवेक नष्ट करि दिनी और यस्-यस् कर्म करनीं कि जो संसार क् विनाश में सहायक हुंनी।
(अर्थात् आसुरी प्रवृत्ति वाल् मनखि कैंकि नि सुणन् और अपंणि अलगै दुनीं बणै ल्हिनी, और सिद्-साद् लोगन् कैं भ्रमित करि बेर् अपंण पक्ष में करि ल्हिनी। उनार् ल्हिजी इन्द्रिय सुख सब सुखन् है महत्वपूर्ण है जां। यस् दुर्बुद्धि लोग भगवान्, माँ-बाप आदि कै कैं लै नि मानन और यस्-यस् अनैतिक कर्म करनीं कि यौ संसार नष्ट हुणाक् कगार पार् पुजि जां। हमर् आस-पास में अच्याल् यस्सै लोग ज्यादे द्येखनी जो धर्म-कर्म, पुज -पाठ आदिक् विरोध करनीं, मंदिर जणंक् विरोध करनीं, हमरि संस्कृतिक् उपहास करनीं, शिवजी कैं दूध क्यलै चड़ोंछा कूनीं, धन कसिक् कमाई जाओ यौ जुगुत में हरदम लागि रूनीं, अलग-अलग पंथ बणानीं माँ-बाप या परिवार है विमुख है जनीं और करवानीं, यौ सब आसुरी स्वभाव क् कारण सम्भव हूँ।)
हिन्दी= जो आसुरी स्वभाव वाले हैं, वे नहीं जानते क्या करना है और क्या नहीं करना चाहिए । उनमें न तो पवित्रता, न उचित आचरण और न ही सत्य पाया जाता है। वे कहते हैं कि यह जगत् मिथ्या है, इसका कोई आधार ही नहीं है, और इसका नियमन किसी ईश्वर द्वारा नहीं होता। उनका कहना है कि यह कामेच्छा से उत्पन्न होता है और काम के अतिरिक्त कोई अन्य कारण नहीं है। ऐसे निष्कर्षों का अनुगमन करते हुए आसुरी प्रवृत्ति के लोग, जिन्होंने आत्मज्ञान खो दिया है और जो बुद्धिहीन हैं, ऐसे अनुपयोगी एवं भयावह कार्यों में प्रवृत्त हो तो हैं जो संसार का विनाश करने वाले हैं।
कामाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता।।१०।।
चिन्तामप्रमेयां च प्रलयानातामुपाश्रिताः।
कामोपभोगपरमा एतिवदिति निश्चिताः।।११।।
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यानेनार्थसञ्चयान्।।१२।।
कुमाऊँनी:
कभ्भीं पुरि नि हुंणी कामाग्निक् सहार ल्ही बेर् अभिमान और झुटि बड़ाईक् चक्कर में डुबी राक्षसी प्रवृत्ति वाल् लोग मोहग्रस्त है बेर् नाशवान चीजों द्वारा अपवित्र कर्म या भोगन् में लागी रूनीं। ऊं यस् समजनीं कि इन्द्रियों कि तृप्ति मात्र मनखिक् मुख्य काम छू, येक् ल्हिजी यस् मनखि मरण-मरण तक जांलै भौत्तै चिन्ता ग्रस्त रूनीं और काम क्रोध सहित इन्द्रिय तृप्ति क् ल्हिजी बस धनसंग्रह करण में लागी रूनीं।
(अर्थात् आसुरी स्वभाव एक प्रकारक् घूंण छू, जो दिन प्रतिदिन मनखिक् विवेक कैं खानैं रूं, और आसुरी स्वभाव वाल् मनखि भोग में यतुक् लिप्त है जां कि ऊ भोग कैं या इन्द्रियों कि तृप्ति कैं ई मनखि जीवनैकि उपलव्धि मानि बेर् भै जां। दिनोंदिन विकि इच्छा बड़तै जानीं और उन् इच्छाओं कैं पुर करण में ऊ हिर (हीरा) जस् जनम कैं धनसंग्रह करन-करनैं खतम करि द्यूं, और भगवान् ज्यु उज्याणि वीक् ध्यान् रूनैं नैं।)
हिन्दी= कभी न सन्तुष्ट होनेवाले काम का आश्रय लेकर तथा गर्व के मद एवं मिथ्या प्रतिष्ठा में डूबे हुए आसुरी लोग इस तरह मोहग्रस्त होकर सदैव क्षणभंगुर वस्तुओं के द्वारा अपवित्र कर्म का व्रत लिए रहते हैं। उनका विश्वास है कि इन्द्रियों की तुष्टि ही मानव सभ्यता की मूल आवश्यकता है। इस प्रकार मरणकाल तक उन्हें अपार चिन्ता होती रहती है। वे अनेकों इच्छाओं के जाल में बंध कर तथा काम और क्रोध के वशीभूत होकर इन्द्रिय तृप्ति के लिए अवैध ढंग से धनसंग्रह करते रहते हैं।
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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