श्रीमद्भगवतगीता - कुमाऊँनी भाषा में तेरूं अध्याय (श्लोक २५-३५)

कुमाऊँनी भाषा में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्, interpretation of ShrimadBhagvatGita in Kumauni Language

कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्

 तेरूं अध्याय - श्लोक (२५ बटि ३५ तक)


ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे।।२५।। अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः।।२६।। कुमाऊँनी:कुछ लोग ध्यान् द्वारा परमात्मा कैं अपंण भित्येर द्येखनी, और कुछ लोग यस् लै हुंनी जो ज्ञान या निष्काम कर्मों द्वारा परमात्मा कैं द्येखनी। और यस् लोग लै हुंनी जो आध्यात्मिकता क् बार् में क्ये नि ज्याणन् पर प्रामाणिक विद्वान् मनखियों कैं सुणणैकि मनोवृतिक् कारण परमात्मा कैं ज्याणनीं और जनम मरणक् मार्ग कैं पार करि ल्हिनीं। (अर्थात् परमेश्वर कैं ज्याणणक् ल्हिजी भौत् ज्ञानी या विद्वान् हुंणैकि लै जर्वत न्हां, सिर्फ भलि (विद्वान् पुरुषों कि) संगत और ज्याणणैकि लालसा हुंण चैं।)
हिन्दी= कुछ लोग परमात्मा को ध्यान के द्वारा अपने भीतर देखते हैं, तो दूसरे लोग ज्ञान के अनुशीलन द्वारा और कुछ ऐसे हैं जो निष्काम कर्म योग द्वारा देखते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो यद्यपि आध्यात्मिक ज्ञान से अवगत नहीं होते अन्यों से परम पुरुष के विषय में सुनकर उनकी पूजा करते हैं। ऐसे लोग प्रामाणिक पुरुषों से श्रवण करने की मनोवृत्ति होने के कारण जन्म तथा मृत्यु के पथ को पार कर जाते हैं।

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ।।२७।।
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति।।२८।।
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्।।२९।।

कुमाऊँनी:
हे अर्जुन! यौ संसार में जतुक् लै जड़-चेतन प जीव पैद् हुंनी उन सब्बूं कैं तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ क् संजोगैल् पैद् हयी ज्याण। जो मनखि नष्ट हुंणी वाल् भूतों में परमेश्वर कैं नाशरहित और समभाव में स्थित द्येखौं वी सच्ची में द्येखौं। किलैकि जो सबन् में समभावैल् स्थित परमेश्वर कैं समान द्येखते हुए, आपूं द्वारा आपूं कैं नष्ट नि करौन् ऊ परम गति कैं प्राप्त हूंछ।
(अर्थात् ज्ये लै पैद् हूं, चाहे ऊ गतिशील छू या गतिशील न्हां, ऊ सब जीव और प्रकृतिक् संजोगैल् पैद् हूं, यौ शरीर, शरीरक् स्वामी और आत्मा जो इन तीनों कैं एक समझौं वी सच्ची में ज्ञानी छू। जो प्रत्येक वस्तु में परमात्मा कैं सर्वत्र द्येखौं ऊ विघटनकारी मानसिकता द्वारा आपूं कैं गिरंण है बचै ल्यूं और जरा-जरा कनैं परमेश्वर क् नजीक जाते रूं।)
हिन्दी= हे अर्जुन! यावन्मात्रजितने भी स्थावर- जङ्गम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न जान। जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है वही यथार्थ देखता है। क्योंकि जो पुरुष सब में समभाव से स्थित परमेश्वर को देखता हुआ स्वयं के द्वारा स्वयं को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति।।३०।।
यदा भूतपृथ्गभावमेकस्थमनुपश्यति।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।३१।।
अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३२।।

कुमाऊँनी:
जो यौ द्येखौं कि सब्बै काम शरीर द्वारा ई करी जानीं, जैकि उत्पत्ति प्रकृति द्वारा है रै, और जो द्येखौं कि आत्मा क्ये लै नि करौन्, वी वास्तव में द्येखौं ।जब विवेकवान मनखि अनेक भौतिक शरीरों कारण विभिन्न स्वरूपों कैं द्येखण बन्द करि द्यों और यौ द्येखों कि कसिक् जीव सर्वत्र फैली छन् तब ऊ ब्रह्म-बोध कैं प्राप्त हूं। जसिक् सब जाग् फैली हुई अकास कांई लै लिप्त नि हुंन, उसिकै आत्मा लै निर्गुण हुणां कारण शरीरक् गुणन् में लिप्त नि हुंन।

(अर्थात् हव् (वायु) या सूर्जकि किरण सब जाग् व्याप्त छू फिरि लै निर्लिप्त छू वी प्रकारैल् आत्मा प्रत्येक जीवधारी में होते हुए लै उन शरीरन् में लिप्त न्हां, शरीर स्वतंत्र इकाई छू वीक् क्रियाकलापों क् आत्मा पार् क्ये प्रभाव नि पड़ून्। और हम क्वे शरीर कैं द्याप्त, कुकूर, बिराव, हाथि या मनखि रूप में द्येखनू यौ हमरि भौतिक दृष्टि छू। वास्तविक दृष्टि यस् भेद नि करनि।)
हिन्दी= जो यह देखता है कि सारे कार्य शरीर द्वारा किये जाते हैं, जिसकी उत्पत्ति प्रकृति से हुई है, और जो देखता है कि आत्मा कुछ भी नहीं करता, वही यथार्थ में देखता है। जब विवेकवान व्यक्ति भौतिक शरीरों के कारण विभिन्न स्वरूपों को देखना बन्द कर देता है, और यह देखता है कि किस प्रकार से जीव सर्वत्र फैले हुए हैं तो वह ब्रह्म- बोध को प्राप्त होता है। शाश्वत दृष्टि सम्पन्न लोग यह देख सकते हैं कि अविनाशी आत्मा दिव्य, शाश्वत तथा गुणों से अतीत है। हे अर्जुन! भौतिक शरीर के साथ सम्पर्क होते हुए भी आत्मा न तो कुछ करता है और न लिप्त होता है।

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।।३३।।
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नंलोकमिमं रविः।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत।।३४।।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।३५।।

कुमाऊँनी:
सर्वव्यापी होते हुए लै आकाश क्वे वस्तु में लिप्त नि हुंन, यसिकै ब्रह्मदृष्टि में स्थित यौ आत्मा शरीर में होते हुए लै शरीर में लिप्त नि हुंन। ज्ये प्रकारैल् एक सूर्य यौ सार्रै ब्रह्माण्ड कैं प्रकाशित करूं उसिकै आत्मा लै शरीराक् भित्येर रै बेर् सम्पूर्ण शरीर कैं अपंणि चेतनाल् प्रकाशित करूं। जो लोग ज्ञानचक्षुओं द्वारा शरीर और ज्ञाता क् अन्तर कैं द्येखि सकौं ऊ भब-बन्धन है मुक्त हुंणक् उपाय लै ज्याणि जां, तब उनूकैं परम लक्ष्य प्राप्त हूंछ।

(अर्थात् सूर्जकि किरण भव्य महलन् में या मन्दिरन् में अथवा सड़ी-गली वस्तुओं में पड़ी पर ऊ गन्दगी या भव्यताक् उन किरणूं पार् क्ये असर नि पड़ून् और हव् (वायु) लै सब जाग् जैं ऊं नक्-भलि जागक् असर हव् पार् लै नि हुन् । यौ ई प्रकारैल् आत्मा प्रत्येक मनखिक् (चाहे ऊ भल् काम करूं या नक् काम करूं) भित्येर निर्लिप्त भावैल् निवास करैं। आब् जो ज्ञानी इन रहस्यों कैं ज्याणों या समजि जां त् ऊ भब-बन्धन है कसिक् मुक्ति मिललि यौ लै ज्याणि जां और मनखि जून में ऊणक् लक्ष्य कैं प्राप्त करि ल्यूं।)
हिन्दी= यद्यपि आकाश सर्वव्यापी है, किन्तु अपनी सूक्ष्म प्रकृति के कारण, किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता। इसी तरह ब्रह्मदृष्टि में स्थित आत्मा, शरीर में स्थित रहते हुए भी शरीर से लिप्त नहीं होता। हे भरतश्रेष्ठ! जिस प्रकार सूर्य अकेले इस सारे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार शरीर के भीतर एक आत्मा सारे शरीर को चेतना से प्रकाशित करता है। जो लोग ज्ञान के चक्षुओं से शरीर तथा शरीर के ज्ञाता के अन्तर को देखते हैं और भव-बन्धन से मुक्ति की विधि को भी जानते हैं, उन्हें परम लक्ष्य प्राप्त होता है।

🌹समस्त स्नेहीजनो आपूं सब्बूं क् सहयोगैल् श्रीमद्भगवद्गीता ज्यु क् यौ तेरूं अध्याय पुरी गो। धन्यवाद्।
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार

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