अल्माड़ाक गज्माड़ - कुमाऊँनी कविता

अल्माड़ाक गज्माड़ - कुमाऊँनी कविता, Poem in Kumaoni about almora town, Kumaoni bhsha ki kavita

-:अल्माड़ाक गज्माड़:-

लेखिका: अरुण प्रभा पंत

भौत पैल्ली कुं छी यकं तो लाग गेयी
अल्माड़ाक गज्माड़, मुचगो हाथ बै
गौं बै ग्याय दाज्यूअल्माड़ पढ़न हुं
स्कूल नि भाय हमर यां अघिल हुं 
पुज ग्याय दाज्यू ठुल शहर अल्माड़
भौय तो पहाड़ै पर महिमा भै अजब
गजबौक गजबजाट भौय खाणपिण
दाज्यू भाय हमार ठुल थाय में खांणी
फुल फुलैयी भात कंतार जा र् वाट
आचमन जतु दाल एक टुपुकजै खट्टै
गौड़् कुल्यूण जतुदाल, थाय भरी भात
घ्यु में रोपै लगयीं जा ठुल्ला र् वाट
पात में टपकीऔर ब्याल भरी खट्टै
बिन गिणी र्वाट, सपोड़ा-सपोड़ करणी
हमर दाज्यू भुखै रै ग्याय हौस्टल में
आपण दगड़ून थैं माठू-माठ सिख ग्याय कम खाण
भालभाल खम्मु-ख्वैर जा हमार दाज्यू
दुबावपताव जा जब पुज आपण घर
आम् इज सबै रै ग्याय हो भिसमांत
बिमार भौछै पोथा कै भौन्है लै दुबौव पतौव
नैनै फिट्ट छुं आमा पढ़ाय लेखाय छी
आज आमैक पुर ज्यौनार जै बणी भै
खा बाबू, और ल्हे कै खाणौं छै इतु कम
आब नि खै सकन्यू हो कटांस है जाल
तकं हरकिशन बैदज्यू वां लिजाऔ
तकं के हैगो, तौ खाणै नि लाग रौय
नैआमा मैं ठीक छुं, हम नि शुणना तेरि
बैद ज्यूल देख-परख, जिबौड़-नाड़ि देख
सब ठीक छु अल्माड़ाक गज्माड़ छन
गौंबै जोलै वां जां तौं अल्माड़ैन है जैं

मौलिक
अरुण प्रभा पंत 

अगर आप कुमाउँनी भाषा के प्रेमी हैं तो अरुण प्रभा पंत के यु-ट्यूब चैनल को सब्सक्राईब करें

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ