
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
तेरूं अध्याय - श्लोक (१३ बटि २४ तक)
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते।।१३।। सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वदोऽक्षिशिरोमुखम्। सर्वतःश्रुतल्लोके सर्वभावृत्य तिष्ठति।।१४।। कुमाऊँनी:आब् मैं तुमूंकैं ज्ञानक् विषय में बतूनूं, जैकैं ज्याणि बटि तुम नित्य ब्रह्म क् आस्वादन करि सकला। यौ ब्रह्म या आत्मा, जो अनादि छू ऊ म्यरै अधीन छू और यौ भौतिक जगतक् कार्य-करण है परे छू। वीक हात्, खुट, आंख , मुनौव कान और गिच सर्वत्र छन्। यौ प्रकारैल् परमात्मा सब्बै वस्तुओं मे व्याप्त हैबेर् अवस्थित छू। (अर्थात् जसिक सूर्य अपंणि हजारों/लाखों/करोडों किरणूं कैं संसार में फैलै रूं और आपूं एक जाग पार् अवस्थित रूं वी प्रकारैल् ब्रह्म लै सब जीवन् में हमेशा-हमेशा व्याप्त छू, और सर्वशक्तिमान परमेश्वर वी छू।)
हिन्दी= अब मैं तुम्हें ज्ञेय के विषय में बताऊंगा, जिसे जानकर तुम नित्य ब्रह्म का आस्वादन कर सकोगे। यह ब्रह्म या आत्मा , जो अनादि है और मेरे अधीन है, इस भौतिक जगत् के कार्य-करण से परे स्थित है। उनके हाथ, पाँव, आंखें, सिर, मुंह तथा कान सर्वत्र हैं । इस प्रकार परमात्मा सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर अवस्थित है।
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।।८।।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।।९।।
अशक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।।१०।।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ।।११।।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।।१२।।
कुमाऊँनी:
मली जो लै ल्येखि रौ वीक् कुमाऊँनी अनुवाद करणैकि जर्वत् मेरि समजैल् न्हां।
(अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि जो लै मिल् बता यौ ई ज्ञानक् लक्षण छन् , बांकि सब अज्ञान छू आब् तुम आपुकैं ठुल समजंछा या नान् समजंछा, धनवान या निर्धन समजंछा, बली या निर्बल समजंछा, ज्ञानी या अज्ञानी समजंछा, धर्मि या अधर्मि समजंछा त् यौ तुमरि भूल छू अज्ञान छू। श्रीमद्भगवद्गीता ज्यु क् यौ ई सार छू कि तुम कर्म करौ, जस- अपजस् या लाभ-हानि मिपार् छोड़ि दियौ, किलैकि तुमर् उद्धार या पतन सब म्यर् हाथ में छू।)
हिन्दी= विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अंधकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन- समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकार करना, तथा परम सत्य की खोज- इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इसके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है।
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च। १५।।
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्।।१६।।
कुमाऊँनी:
परमात्मा सब्बै इन्द्रियों क् मूल स्रोत छू, फिरि लै ऊ इन्द्रिय रहित छू और सब जीवों क् पालनकर्ता होते हुए लै अनासक्त (मोह माया रहित) छू। प्रकृतिक् गुणन् है अलग होते हुए लै सार्री प्रकृतिक् और उनर् गुणों क् स्वामी छू। ऊ सब्बै जड़ तथा जंगम जीवों क् भ्यार् और भितेर स्थित छू। अति सूक्ष्म (नान् हैबेर् लै नान्) हुंण कारण भौतिक इन्द्रियों द्वारा ज्याणण् या द्येखण है लै परे छू। परमात्मा भौत् दूर होते हुए लै भौत्तै नजिक छू।
(अर्थात् परमात्मा एक एसि दिव्य शक्ति छू, जो हरदम हमर आघिल्- पछिल् , भ्यार्- भितेर उपस्थित छू, परन्तु हम संसारी मन या आखों अथवा इन्द्रियों द्वारा न त् वीकैं देखि सकौन् और न आभास करि सकौन्। परमात्मा कैं समजंण ल्हिजी वीकि आराधना करंण जरूरी छूं और आराधना लै निःस्वार्थ हुंण चैं। स्वार्थी मनखि न त् अपंण भल् करि सकौन् और न समाजौक्? हनुमान ज्यु कि निःस्वार्थ सेवा और सुदामा ज्यु कि निःस्वार्थ मित्रता कैं उदाहरणार्थ ल्हि सकंछा।)
हिन्दी= परमात्मा समस्त इन्द्रियों के मूल स्रोत हैं, फिर भी वे इन्द्रियों से रहित हैं। वे समस्त जीवों के पालनकर्ता होकर भी अनासक्त हैं। वे प्रकृति के गुणों से परे हैं, फिर भी वे भौतिक प्रकृति के समस्त गुणों के स्वामी हैं। परम सत्य जड़ तथा जंगम समस्त जीवों के बाहर तथा भीतर स्थित है। सूक्ष्म होने के कारण वे भौतिक इन्द्रियों के द्वारा जानने या देखने से परे है। यद्यपि वे बहुत दूर हैं, किन्तु हम सबके अत्यन्त निकट भी हैं।
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।१७।।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।।१८।।
कुमाऊँनी:
हमूकैं भले ही परमात्मा सब्बै जीवोंक् मध्य बंटी हुयी लागौं, पर ऊ कभ्भीं लै बंटी हुयी न्हैति। ऊ एक रूप में स्थित छू, ऊ सब्बै जीवोंक् पालन/पोषण लै करूँ त् संहार लै करूँ। परमात्मा सब प्रकाशमान वस्तुओं क् प्रकाशस्रोत छू। ऊ भौतिक अंधकार है परे छू और अगोचर छू। ऊ ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानक् लक्ष्य छू, और सब जीवोंक् हृदय में स्थित छू।
(अर्थात् जसिक् हम संसाराक् क्वे लै जाग् न्है जों त् सूर्य हमर् मुनौव माथे देखियल्, वी प्रकारैल् परमात्मा लै सब जाग्/ सब जीवों में होते हुए लै अपंणि जाग पार् अवस्थित छू। परमात्मा जतुक् लै प्रकाशमान वस्तु छन् सूर्य, चंद्र, तार या दीपक आदि सबनक् प्रकाशस्रोत छू। परमात्मा ज्ञान (जानकारी), ज्ञेय (ज्याणंण योग्य) और ज्ञानक् (समस्त जानकारीक्) स्रोत लै छू। परमात्मा है आघिल् ज्याणंण लैक् क्ये न्हैति।)
हिन्दी=यद्यपि परमात्मा जीवों के मध्य विभाजित प्रतीत होता है, लेकिन वह कभी भी विभाजित नहीं होता। वह एक रूप में स्थित है। यद्यपि वह प्रत्येक जीव का पालन/पोषण करता है। लेकिन यह समझना चाहिए कि वह सबों का संहारकर्ता भी है। वह समस्त प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्रोत हैं। वे भौतिक अंधकार से परे हैं और अगोचर हैं । वे ज्ञान हैं , ज्ञेय हैं और ज्ञान के लक्ष्य हैं और सबके हृदय में स्थित हैं।
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञंयं चित्तं समासतः।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ।।१९।।
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्।।२०।।
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।।२१।।
कुमाऊँनी:
यौ प्रकारैल् मिल् कर्म, क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञानक् बार् में संक्षिप्त रूपैल् बता। येकैं केवल म्यर् भक्त भलि भांति समजि सकनीं और म्यर् स्वभाव कैं प्राप्त हुंनी। प्रकृति और जीवों कैं अनादि ज्याणौ, सिर्फ उनर् विकार और गुण प्रकृतिजन्य छन्। ,यौ प्रकृति भौतिक कारणों और कार्यों कि हेतु कयी गे और जीव यौ संसारक् सुख और दुख भोगक् कारण बतै राखी।
(अर्थात् जब तक यौ नि समजी जाओ कि भौतिकता और आध्यात्मिकता क्ये छु तब तक शास्त्रों या ग्रन्थों में लिखी हुई बात समझ में ऊंण कठिन हूंछ। जब मनखि यौ समजि जां कि भौतिकता मात्र सुख या दुख भोगणक् ल्हिजी छू त् ऊ अध्यात्मिक ज्ञान कैं प्राप्त करणक् उपाय करूँ और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त हुण पार वीक माया, मोह, लोभ, अहंकार आदि दुर्गुण आफ्फी नष्ट है जनीं तब मनखि पवित्र है जां और भगवान् ज्यु कि शरण में न्है जां।)
हिन्दी= इस प्रकार मैंने कर्म, क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेय का संक्षिप्त वर्णन किया है। इसे केवल मेरे भक्त ही पूरी तरह समझ सकते हैं और इस तरह मेरे स्वभाव को प्राप्त हो सकते हैं । प्रकृति तथा जीवों को अनादि समझना चाहिए, उनके गुण और विकार प्रकृतिजन्य हैं। प्रकृति समस्त भौतिक कारणों तथा कार्यों की हेतु कही गयी है, और जीव इस संसार में विविध सुख-दुख के भोग का कारण कहा जाता है।
पुरुषः प्रकृतिस्थोहि भुङ्क्ते प्रकृतिर्जान्गुणान्।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु।।२२।।
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः।।२३।।
य एवं वेत्ति पुरुषः प्रकृतिं च गुणैः सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।।२४।।
कुमाऊँनी:
यौ प्रकारैल् जीव प्रकृतिक् तीनों गुणौंक् भोग करन-करनैं प्रकृति में ई अपुंण जीवन बितां । यस् ऊ प्रकृतिक् संगतक् कारण हूँ और वीकैं उत्तम या अधम योनि प्राप्त हुनैं रूनीं। फिरि लै यौ शरीर में एक दुसर् भोक्ता लै छू, जो ईश्वर, स्वामी, साक्षी या अनुमति दिण वाल् रूप में विद्यमान छू, ऊ ई परमात्मा कयी जां। जो मनखि प्रकृति, जीव और प्रकृतिक् गुणौंकि अन्तःक्रियाओंक् सम्बन्धी इन विचारों कैं समजि जां, वीकि मुक्ति सुनिश्चित छू। ऊ चाहे वर्तमान में क्वे लै स्थिति में छू, पर वीक् पुनर्जन्म कतई सम्भव न्हैं।
(अर्थात् यौ स्पष्ट रूपैल् बतायी गो कि संगति महत्वपूर्ण छू, हम जसि संगति करूल् वैस्सी बुद्धि, खान-पान, रहन- सहन, वेष-भूषा या शब्दों क् आदान-प्रदान हमूं पार् प्रभावी हौल् । तब साधु या सज्जन अथवा विद्वद्जनों कि संगति हमर् ल्हिजी लाभकारी और फलदायी है सकीं । भगवान् ज्यु कि भक्ति करणाक् ल्हिजी धनवान हुंण जरूरी न्हैति, हम जस् लै छूं, जो अवस्था में लै छूं, या हमरि पास ज्ये लै छू ऊमजि खुश रहण चैं और परमात्मा कैं कभ्भीं लै भुलण नि चैन्। पर भलि या नकि संगतिक् ध्यान् त् हमूकैं धरणै पड़ौल्। गलत कर्म करंण तक क्वे न क्वे हमूकैं टोका-टाकी अवश्य करौं ऊ ई हमर् साक्षी, अन्तर्मन या परमात्मा छू।)
हिन्दी= इस प्रकार जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता हुआ प्रकृति में ही जीवन बिताता है। यह उस प्रकृति के साथ उसकी संगति का कारण है। और उसे उत्तम तथा अधम योनियां मिलती रहती हैं । फिर भी इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है, जो ईश्वर है, परम स्वामी है और साक्षी तथा अनुमति देनेवाले के रूप में विद्यमान है, वही परमात्मा कहलाता है। जो व्यक्ति प्रकृति, जीव तथा प्रकृति के गुणों की अन्तःक्रिया से सम्बन्धित इस विचारधारा को, समझ लेता है, उसे मुक्ति की प्राप्ति सुनिश्चित है। उसकी वर्तमान स्थिति चाहे जैसी हो, परन्तु उसका पुनर्जन्म नहीं होगा।
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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