
-:द्वि द्वि बलाणी मोतरामज्यू:-
लेखिका: अरुण प्रभा पंत
"भ्यार को छु चा धैं!"इजैल धाल लगै। "त्यार कान बाजणयीं क्वे न्हां",मैल एसिकै कै दे। "नै नै इज ठीक कुणै, क्वे तो छु" "जानी कन पै द्वार खोल दे" मैल जाण बुझ बेर कै दे और मेरि नानि बैण द्वार खोलण हुं न्है गे और मेरि चाल कामयाब भै और मकं उठण नि पड़। मै समझ गोछ्ंयु कि "के हुणौ नानतिनो" वाल मोतराम बड़बाज्यू हुन्याल। वीं छन।
"का छन त्यार बाब हाब?"
नानि बैण--"भितेर छन"
मोतरामज्यू--"के के है रौ, बांकि लोगबाग कां छिन, त्यार मसतारि हसतारि के करणैं।"
मेरि बैण--"इज रिश्या में दाद भितेर"
मोतरामज्यू--"तुमरि पढा़ई हढा़य कस चल लै नातिणी!"
बैणि --"ठीकै"
मोतरामज्यू आब बाबू इंतजार में भाय पर बाबू कं ऐल फुर्सतै नै, खैर भ्यार ऐबेर नमस्कार तो करणै भै। बाबू नकली मुसकै बेर भ्यार हुं आय तो बैणि झट्टकन भीतेर हुं ऐगे। हम सबै तनन थैं चिढ़नेर भयां, एक तो रोज रत्तै ब्याल तौ ऐ बेर धोधोसंदी जानेर भ्या, चहा पिबेर फिर खाणौ टैम में खाण हुं लै पुछणै भै। जब तौं न्है गया तो हम द्वार बंद कर जोरैल सांस ल्हिबेर झट्ट चिटकन लगै दिनेर भयां तो मेरि बैणि कुनेर भै---"अल्लै द्वि घंट मांथ फिर ऐ पुजाल जागौ।"
मोतराम बड़बाज्यू हमार क्वे नि भाय पर हमार बाबू तनन कं काकज्यू कुनेर भ्या, तसि तौ हमार बड़बाजि बण ग्याय। हमार घराक पिछाडि़ जो तीन घर छन उनन में एक तनौर भौय। तनार च्याल ब्वारि और घरवाय रुनी बल वां, हमूल शुणि भौय। पत्त नै के बात छु कि तनार खुट आपण घर में रुकन,तौं रत्तै नै ध्वे बेर निकय जानन भ्यार हुं फिर पत्त नै कभत घर जानन मालूम नै। हमार यां द्वि टैमौक चहा तनौर पक्क छु। कभै कभै खै बेरै जानन हमार यां बै।
हम तनन कं नक नि मानन पर तौं हर बात में अत्ति कर दिनन। और हर बात कं हर शब्द कं द्वि बेर कुणैकि तनन कं सार जै छु कुंछा। अज्यान तनौर जतु फालतू टैम कैक पास भौय और फिर जब हम हर बखत आपण घर छाडि़ दुसराक घर बैठ्ठूंलो तो इज्जत कम हैयी जानेर भै। पाणि मांगला तो कौल--"द्विएक गिलास हिलास पाणि हाणि पेवाऔ तौ अत्ति तीस हीस जै लागरै कुंछा।" तैक बदाल "पाणि ल्याऔ कून धैं"
जाण बखत कौल--"जांनु पै आब जरा भ्यार ह्यार लै देख हेक ल्हिनु पै धौं कै के जै हैरौ पै।" उसी तौ सिदसाद हमार पहाडा़क बुढ़मैस भाय पर बलाण में बिस्वार जौ लगै बेर निमुचि लगै दिनी। एक दिन हमूल शुणी कि मोतरामज्यू नि दिखीणाय,के भौ न्हौल? बाबूल पत्त लगून कून कूनै और तीन दिन है ग्याय पर मोतरामज्यु दिखीणै नै तो हमन कं लै फिकर जै भै कुंछा।
एक दिन मैं जो सबन है जियादा मोतरामबड़बाज्यू थैं खार खांछी पत्त लगूण हुं उनार घर पुज्यूं तो पत्त चलौ कि उनार तो क्वे च्याल ब्वारि घरवाय छै न्हातिन। भौत पैल्ली उनौर च्योल फौज में शहीद हैगोछी अण बेवइय्यै यो घर तनौर किरैक छु। घरवाय तनरि तबै खतम हैगेछिन जब तनर च्योल कुछेक बर्सौक छीऔर आपण च्योलैकि पैंशन में आदू पैशनल तौ एक च्योलकं पढू़नी जो भ्यार पढू़ और आदू पैशनैल तौ आपण गुजार करनीऔर मकानौक किरौ दिनी।
यो बात मकं तनर मकान मालिकैल बतै जो आज्जै तनन कं अस्पताल भर्ती करै बेर ऐरौ तौ भौत दिन बै बिस्तरै में छीं। मैल यो बात घर ऐबेर आपण इजाक मुखतिर डाढ़ हालते हुए बतै। हम सबै हैप खैबेर रै गेयां और मनैमन हम सबन कं आपण व्यैभार पर भौत्तै अफसोस भौ। पर कभै उनूल लै हमन थै सांचि बात नि बतै पत्त नै किलै, शिबौ शिबशिब कताण कल्ज भौय मोतराम बड़बाज्यूक।
मौलिक
अरुण प्रभा पंत, नासिक, 08,01,2021
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