जिम कार्बेट पार्काक् शेर......

कुमाऊँनी भाषा में शेर-शायरी, ज्ञान पंत जी द्वारा  Sher-Shayari in Kumaoni language by Gyan Pant, Kumaoni Shayari

जिम कार्बेट पार्काक् शेर......

रचनाकार:  ज्ञान पंत

तेरि 
मेरि और 
"वी" बात .... 
दिन हौओ या 
रात 
कभै सगीन न्हाँ........

यो 
तु जाँणछी
मै जाणूँ ......... 
दुहौर क्वे 
जाँणन न्हाँ ....।

हा्व चली 
बादल ऐयीं 
पग्लियै बेरि
जानै रयीं।

तु 
इन्द्रैणि छै त
मूँ 
सुकिल रंग छूँ।

काँ 
जालै 
घुमि-फिरि बेरि 
ययीं आलै। 

मेरि दुन्नी 
ते जाँणे
तेरि दुन्नी
तुयी जाँणै।
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जै कैं तु 
ढुँङ - पाथर समझि बेरि 
धक्यूँण ण लागि रौछै 
मसीन ' नैलि खँड़ि - खाँणि बेरि 
गाड़ बगूँण लागि रौछै ........

फोड़ि - फाड़ि बेरि 
भाँटनौ -  चुर करण लागि रौछै नै 
..... उ मैंस छ मैंस ! 
तराँण उमै ले भये ....
ऐल 
मुनिटोप  लगै ल्ही रौ कै जे कि हुँ 
कधली चढम्म उठौल जब त 
सब चाय्यै रै जा्ल .....

पिरथवी कामैणि बैजालि 
गाड़ पगैलि जालि 
बोट-डाव नाचण बै जा्ल 
अगाश बटी 
बन्धा्र फुटा्ल ......

भतेर लुकी 
मैंसनां आँङ ले द्याप्त  आल .........
भरबाटुन समायी 
तौल ,पराद ,थायि आफि है बाजा्ल ..... 
टिंग टिंग  टींग - टिंग- टिंगा टींग 
सरग में बादल 
हुड़ुक बजाल .....

दुँङ दुँङ-- दुङ दूँङ -- दूँड .... 
और कड़कतायि ......
धड़ाम्म , कती बज्जर ले पड़ौल 
तब समझि ल्हीयै 
शिब ज्यू 
तांडव करण बैगियीं 
पहाड़ में 
और "पहाड़ी" में ले ...।

शब्दार्थ:
वी - उसकी
सगीन न्हाँ - खतम नहीं होती
पग्लियै बेरि - पागल करके
जानै रयीं - चलते बने
इन्द्रैणि - इन्द्र धनुष
सुकिल - सफेद 
मूँ  -  मैं
ते जाँणे - तुम तक
तुयी जाँणै - तुम्हीं जानो
धक्यूँण - धक्का देना,
खँणि खाँणि बेरि - खोद खाद कर, 
भाँटनौ चुर - पसलियाँ तोड़ना 
तराँण - जान, 
मुनिटोप - सर झुका हुआ,  
कधली -- कभी ,  
चढम्म - तड़ से ,  
बन्धार - छत से टपकती धार, 
भरभाटुन - दोछत्ती,  
कड़कतायि - आकाशीय बिजली


July 06,07, 2017
...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार

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