
मीं गोपि तुमरि
रचनाकार: हिमानी
हे गोविंद!
ग्यान कि बात मी कि जाणूं
ध्यान कि बात ले मी न जाणनूं
मी जाणनूं यकै प्रीत की बात
हे गोविंद!
तुम म्यर प्राणपिया छौ
यमुना पुलिन पै कभै मीकै लि बुलाया
अपणि बंशी की तान मीकै लि सुणाया
म्यर दगड़ भौत नाच्या तुमिलै
यो पहाड़ में
मी यकलै रूनी
कष्ट भौत यकलै भोगनीं
हे गोविंद!
आँखमिचौलि अब
तुमि छोड़ि दियौ
म्यर पास अब आ हि जाऔ
हे गोविंद!
जनम-जनम बटि
मी भटक नयूं
छोड़ि बेर मीकै अब
कथै न जाया
लख चौरासी मी नाच्यूं अब तलक
मीकै अब त् संभालि हि लिया
मी कलजुग कि
गोपि छूं तुमरि
दिनै लिजी तुमुंकै म्यर पास
कुछ न छु
प्रेमभाव क् अलावा
वीकि नौनि (माखन) तुम
चाखि हि जाया
और तारण म्योर अब त्
करि हि दिया.
--हिमानी ©, 31-07-2020
-सर्वाधिकार सुरक्षित
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