
लोक विधाओंक महत्व समझणैंई नानतिन
लेखक: चारु तिवारी
नई छाणक नानतिनाल आजकल अलग-अलग मंचो माध्यमैल आपण पुराण चीजोंक खोजणैंक अभियान चलै राखो। हमार भौते पुराण गीत-संगीत कैं लोगोंक सामणि ल्यौणि।
संचारक युग म हमर लिजी कतुक चीज सरल है गैईं। आब हमरि पहुंच आम लोगन तक छू। सोशल मीडियाक सबूहैं ठुल फैद य छू कि हम एक-दुसरे दगै जल्दी संवाद कर सकनूं। नकि-भलि बात लै समझ सकनूं। दुनि कं समझणंक एक नई मंच लै तैयार हैगो। कुमाउनी भाषा, संस्कृति, साहित्य और कलाक विस्तारक दगड़ि इनार संरक्षण और लोक विधाओं कं बचैंणक लै एक सार्थंक रस्त निकलणौं। हमार नई छांणाक नानतिनाल आपणि भाषा, संस्कृति, लोकगीत, लोकविधाओं, इतिहास कं समझणैंक नई पहल करि हालि। उं सोशल मीडियाक भौत भल उपयोग कर बैर नई-नई चीजों कं लोगों बीच म ल्यौंण रैईं। य लै भलि बात छू कि एक पीढ़ी जो आपण संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज, गीत-बादों कं भुलण भैगै छी, नई नानतिन पुनर्जीवित करणैंक कोशिश करण रैईं। भौत सोशल साइट, मंच और संगठन तैयार है गईं, जनमूं हम आपण पुराण गीत, समय दगै हरै गैई लोक विधाओं कं लै देख सकनूं।
कुमाऊं बटि आजादी है पैलि और आजादी बाद लगातार लोगोंक भ्यार जांण जारी रौछ। कुमाउनी लोग देश-विदेश म जां लै गईं आपण संस्कृति-भाषा कलैं दगाड़ लिगैईं। हिन्दी साहित्य, रंगमंच, सिनेमा आदि जो लै क्षेत्र में कुमाउनी लोगोंन हस्तक्षेप करो वां क्यै न क्यै प्रकारैल आपणि भाषा कं स्थापित करणक प्रयास करौ।
कुमाऊंक पैल रंगमंच रामलीला छू। जागि-जागि लागणी म्याल-ठ्याल, होली ठेठर, ब्यानौ म हौंणी रत्यालि, स्वांग, जात, हिलजात्रा, हुडकी बौल, जागर आदि दगै हमर पुर समाज चलनैर भय। यूं लोक विधाओं म हमार कतुक अन्तर्कथा हाय। सबूक सामूहिक। लोक बै निकलणि जो आवाज छू वू कभैं व्यक्तिगत नि है सकनि। बणौंक उदासी बै निकलणि ‘न्यौलि’ हो या गौंक चैतार बटिक निकलणि ‘भगनौल’, सबूं दगै मिलबैर बनणि ‘झ्वाण’ हो या पारंपरिक ‘ऋतुगीत’ या ‘मांगलगीत’ यूं सबूल यांक लोकविधाओं को भौते समृद्ध करौ।
लोकवाद्यों म ढोल, नगाड़ा, बांसुरी, जौल्यां-मुरली, नागफनी, रणसिंगा, डफली, हुड़का शंख, घंट, इकतारा, दोतारा, सारंगी, बिणाई, खंजरी, तुरही, डौंर, डमरू, अलगोला, मशकबीन, खड़ताल, घानी, चिमटा, मजीरा, कंसेरी, झांझ तक लोकक यतू ठुल संसार छू कि जतुक लै हम उकैं पकड़नै कोशिश करनूं उ बडतै जां। कुमाउनी लोकगीतोंक संसार भौत ठुल छू। कुमाउनी लोकगीतों म आत्मसात करणैंक भौत शक्ति छू और अभिव्यक्त करणैंक कला लै। कुमाउनी लोक गीतोंक कतुक रंग छन। इनूम दुख-सुखाक क्वीण छन, प्रेम-विछोहक दर्द छन, नराई-बाडुली आत्मीयता छू, उत्साह-उमंग छू, चेतना छू। कभैं-कभैं इन लोकगीतों म विद्रोह और प्रतिकाराक स्वर लै सुणाई दिनी। इनैर खासियत छू इनार सामूहिक स्वर। समयाक साथ इन सब विधाओं में एक समय म जरूर ठहराव आछ। जब गौंनूपन बै लोग-बाग रोजगाराक लिजी भ्यार जांण शुरू होछौ तो कुमाऊंक यूं लोक विधाओं सामणि लै नई प्रकाराक संकट ठाड़ है गईं। पुराण पीढ़ीक समाप्त हौंणक बाद जो परंपरा म मिली चीज छि वूं पिछाड़ छूटण लागीं। यूं कतुक विधाओं कैं नई पीढ़ील देख लै न्हैत।

पैलि समय कुमाऊंक लोक विधाओंक प्रचाराक लिजी आकाशवाणी भौते सशक्त माध्यम छी। संगठनौंक और व्यक्तियोंक लै भौत प्रयास करीं। बीच म एक बार लागौ कि शायद नई पीढ़ी आपण भाषा, संस्कृति, साहित्य और कलाओं है विमुख हैगै, लेकिन आज नई छांणाक नानतिनाल जो नई तरीकैल आपण इतिहास, संस्कृति, भाषा और लोकविधाओं कं समझणक कोशिश करी उ भौते उम्मीद जगोंणि छन। नई छांणक नानतिनाल आजकल अलग-अलग मंचों और सोशल मीडिया माध्यमैल आपण पुराण चीजों क खोजणैंक अभियान चलै राखौ। भौते संगठन और साइट यास छन जो हमार भौते पुराण गीत-संगीत क लोगों सामणि ल्यौणि। कई लोग पुराण संगीत म नई प्रयोग कर बैर उकैं आमजन तक पहुंचैंणैक कोशिश लै करणीं। कुमाउनी भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसाराक लिजी कुमाउनी वार्तालापाक मंच लै बनै राखीं। भौत नाट्य संस्था पुराण लोकथाओं और लोकगाथाओं पर नाटक ले मंचित करणीं। पिछाल दिनों सरकारैल कुमाउनी भाषा कं स्कूली पाठ्यक्रम म लगौंणाक लिजी लै प्रयास करौ। कुमाउनी लोकभाषा और संस्कृतिक प्रचार-प्रसाराक लिजी आई य चेतनाल उम्मीद करी जांण चैंछ कि नई पीढ़ी लोकक महत्व कं समझते हुये एक समृद्ध भाषा, साहित्य और संस्कृतिक सरंक्षण लिजी नई समझक साथ अघिल बडैलि।
चारु तिवारी, 02-07-2021
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