
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
सत्रहूं अध्याय - श्लोक (१७ बटि २८ तक)
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्विकं परिचक्षते।।१७।। सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् । क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।१८।। मूढग्रहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।१९।। दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतम्।।२०।। कुमाऊँनी:भौतिक लाभैकि इच्छा बगैर, परमेश्वर में विश्वास करणीं मनखि द्वारा, भल् भावैल् करी हुई तपस्या सात्विक छू। अभिमान वश, सम्मान प्राप्त करणक् ल्हिजी या अपंणि पुज करंण ल्हिजी करी हुई तपस्या राजसी कयी जैं। मूर्खतावश अपंण शरीर कैं कष्ट दी बेर,औरूंक् नाश करणक् ल्हिजी करी हुई तपस्या तामसी बतै रै। अपंण कर्तव्य समजिबेर्, हमूकैं वापस मिलौल् यस् नि समजि बेर्, सई समय और जाग् और सई पात्र कैं दियी हुई दान , सात्विक कयी जां। (अर्थात् दान, तप और यज्ञादि कर्म निःस्वार्थ हुंण चैनीं, जै में समाजैकि भलाई और सुरक्षा निहित छू यस् कर्म हमूकैं करंण चैनीं। जो आपूं कैं पुजवानीं और समाजैकि उन्नति में क्ये योगदान नि करन् यस् मनखि ( चाहे साधु, कथावाचक, महाज्ञानी, पंडित आदि-आदिक् भेष में ई किलै नि छन् ) है दूर रूंण चैं। किलैकि यस मनखि सिर्फ अपंण भल् करनीं, और जगद्गुरु आदि ऐसि उपाधि लै प्राप्त करि ल्हिनी? जगद्गुरु सिर्फ भगवान् श्रीकृष्ण ज्यु ई छन् और क्वे न्हां।)
हिन्दी= भौतिक लाभ की इच्छा न करने वाले तथा केवल परमेश्वर में प्रवृत्त मनुष्यों द्वारा दिव्य श्रद्धा से सम्पन्न यह तीन प्रकार की तपस्या सात्विक कहलाती है। जो तपस्या दम्भ पूर्वक तथा सम्मान, सत्कार एवं अपनी स्वयं की पूजा कराने हेतु की जाती है, वह राजसी अर्थात रजोगुणी कहलाती है, जो न तो स्थायी होती है न शास्वत होती है। मूर्खतावश आत्म-उत्पीड़न के लिए या अन्यों को विनष्ट करने या हानि पहुंचाने के लिए की गयी तपस्या तामसी अर्थात तमोगुणी कहलाती है। जो दान कर्तव्य समझ कर, किसी प्रत्युपकार की आशा के बिना, समुचित काल तथा स्थान में और योग्य व्यक्ति को दिया जाता है, वह दान सात्विक माना जाता है।
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुदिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृत।।२१।।
आदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामससमुदाहृतम्।।२२।।
ૐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः समृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विसिताः पुरा।।२३।।
तस्माद् ૐ इत्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्र्हमवादिनाम्।।२४।।
कुमाऊँनी:
जो दान फल प्राप्ति क् ल्हिजी या बेमनैल् (द्यण छू कैबेर) दियी जां ऊ रजोगुणी दान हूं। जो दान अपवित्र जाग् पार्, गलत समय में, कुपात्र कैं या बिना आदर करियै दियी जां ऊ तमोगुणी दान कयी जां। सृष्टिक् आदिकाल बै ૐ तत् सत् यौं तीन आंखर परब्रह्म कैं सूचित करंण क् ल्हिजी प्रयोग करी जानीं। इन आंखरूं द्वारा यज्ञ करंण तक पुरोहित ब्रह्म कैं संतुष्ट करनीं। योगीजन् ब्रह्म कैं प्राप्त करंण वास्ते, शास्त्रीय विधिल् यज्ञ, दान और तपैकि क्रियाओं क् शुरुआत ૐ शब्दैक् उच्चारण करि बेर् करनीं।
(अर्थात् जप, तप या दान या फिरि यज्ञादि अनुष्ठान कभ्भीं लै लालचवश या दिखावा ल्हिजी नि करंण चैन् । यस् जप, तप दान और यज्ञ निष्फल है जनीं, जप करणक् ल्हिजी उत्तम स्थान, तप करणक् ल्हिजी पवित्र मन, दान करणक् ल्हिजी योग्य पात्र और यज्ञ करणक् ल्हिजी उत्तम और योग्य पुरोहितक् चयन करंण चैं। ૐ तत् सत् यौं तीन ब्रह्म वाक्य छन् यज्ञ करंण तक पुरोहितों द्वारा उच्चारित करी जानीं और यज्ञ, दान, तप करंण है पैली योगीजन् ૐ आंखरक् उच्चारण करि बेर् शुरुआत करनीं।)
हिन्दी= जो दान प्रत्युपकार की भावना से का कर्म फल की इच्छा से या फिर अनिच्छा पूर्वक किया जाता है, वह रजोगुणी कहलाता है। जो दान किसी अपवित्र स्थान में, अनुचित समय में, किसी अयोग्य व्यक्ति को या बिना समुचित ध्यान तथा आदर से दिया जाता है, वह दान तामसी कहा जाता है। सृष्टि के आदिकाल से ૐ तत् सत् ये तीन शब्द परब्रह्म को सूचित करने के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे हैं। ये तीनों सांकेतिक अभिव्यक्तियां ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करते समय तथा ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिए यज्ञों के समय प्रयुक्त होती थीं। अतएव योगीजन ब्रह्म की शान्ति के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञ, दान तथा तपस्या की समस्त क्रियाओं का शुभारंभ सदैव ૐ से करते हैं।
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।२५।।
सद्भावे साधुभावे च सदितायेतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते।।२६।।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते।।२७।।
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।२८।।
कुमाऊँनी:
मनखि कैं चैं कि कर्मफलैकि इच्छा बगैर अनेक प्रकारक् यज्ञ, तप और दान (तत्) यस् कै बेर् पुर करौ। यौ क्रिया भवबन्धन है मुक्त हुणां ल्हिजी बतै रै। भक्तिमय यज्ञक् लक्ष्य परमसत्य छू, श्रेष्ठ भाव में (सत् )शब्द प्रयोग करी जां। यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति छू ऊ लै सत् छू और परमात्मा कैं प्रशन्न करंण ल्हिजी करी जां येक् ल्हिजी लै सत् कयी जां। हे अर्जुन! श्रद्धा बिना करी हुयी यज्ञ, तप या दान जो लै शुभकर्म छन् ऊं असत् कयी जानीं और उनर् यौ लोक या परलोक द्वीनूं में क्ये लाभ नि मिलौन्।
(अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि- जो लै शुभकर्म करौ भगवान् कैं समर्पित है बेर् करौं, श्रद्धा या विश्वास बगैर करी हुई चाहे यज्ञ हौओ तप होओ या फिरि दान हौओ क्ये कामक् न्हां।)
हिन्दी= मनुष्य को चाहिए कि कर्मफल की इच्छा किये बिना विविध प्रकार के यज्ञ, तप तथा दान को तत् शब्द कहकर सम्पन्न करे। ऐसी दिव्य क्रियाओं का उद्देश्य भवबन्धन से मुक्त होना है। परमसत्य, भक्तिमय यज्ञ का लक्ष्य है और उसे सत् शब्द से अभिहित किया जाता है। ऐसे यज्ञ का सम्पन्न कर्ता सत् कहलाता है। इस प्रकार यज्ञ, तप और दान के सारे कर्म परमपुरुष को प्रशन्न करने के लिए सम्पन्न किये जाते हैं सत् है। हे पार्थ! श्रद्धा के बिना यज्ञ, दान, तप के रूप में जो भी किया जाता है, वह नश्वर है अर्थात असत् कहलाता है और इस जन्म तथा अगले जन्म दोनों में ही व्यर्थ जाता है।
(स्नेहीजनों आपु सब्बूं क् सहयोगैल् श्रीमद्भगवद्गीता ज्यु क् यौ सत्तरूं अध्याय पुरी गो।)
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर

श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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