सब भूलि गयूं हो - कुमाऊँनी कविता

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-:सब भूलि गयूं हो:-

रचनाकार: हिमानी

शहर में एबेर मी
भेषी गयूं
अपन बोली-भाषा
सब भूलि गयूं हो
अपन खाण ले
भूलि गयूं
अपण पैणन ले
भूलि गयूं
न पक्क शहरी
बन पायूं
न गौं की चेली
रै पायूं

पैंलि-पैंलि जब
शहर में आयूं त
दूसर न की
हंसी उडूंन लिजी
या त
उनरी काटनी
करन टैम
हम आपस में
अपन बोली में
ट्याप-टुप
कर लिंछ्यां
जस्स-जस्स
शहरी हम होयां
सब कुछ भूलि गयां हो
अब सब छोड़ि हालौ
सब कुछ छोड़ि बेर
अब अंग्रेजी क पिछाड़ि
हाथ ध्वै बेर
पडि. गयूं हो
मी ले.
सब कुछ भूलि गयूं हो
मी ले.

-हिमानी©®, 25-07-2020

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