
"पाठशाला"
कुमाऊँनी कविता
रचनाकार: मोहन चन्द्र जोशी
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बिन गुरू की पाठशाला वीक पछिल भोजनमाता उ पाकशाला।
नि ग्वाव गुसैं क् विद्यार्थी हमार् थाइ बजाल और भात खाला।।
कदिनैं मौसम घनघोर तो घरैपन कदिनैं गरम में ताति आला।
कदिनैं तबियत नरम कैबेर छुट्टी मांगिबेर ल्हिआला।।
गृहकार्य करौंणीं को य गलत कैं गलत बतौंणीं को?
को हनल इनर भविष्य बणौंणीं को हनल इनर गुसैं ग्वाला?
कॉलेज का विषय प्रयोग वाव बिन विषय-गुरु काँ खुलौ ताला?
बिन भाषा गुरु लेखिया ऑखर यौं हरप उ भैंस जसा काला।।
राजनीति घोषणा का चलते दशकों तक बिन परिसर डिग्री।
लाचार बेबसी पीढ़ी पर जनसेवक की कसि य बेफिक्री।।
विकास खड़ंजों में रैगो प्रस्ताव उधरी में टाल् हाला।
शिक्षालय हो सम्पन्न अगर विकास टिकाऊ है जाला।।
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मोहन जोशी, गरुड़, बागेश्वर। 01-02-2016
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