
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
कैका लिजी
बर्ख त
कैका लिजी
आफत भै पहाड़ में
आ्ब ....
के करी जाऔ
दुन्नी भै
कभै थामींन न्हाँ
पाँणी चार
बगते रुँछि .....
मलि बटी
तलिकै ऊँण में
पत्त न कतु
गौं
रौड़, गाड़, गध्या्र
छीड़ और ताल
बणूँन-बणूँनै
सिमार में पुजें त
हरिया-हरीं
स्या्र में नाज 'क
और जिन्दगी 'क ले
"कुथव" भरी जानीं.....
दिगौ! यतु हैयी बाद ले
मनखिंनां ख्वा्र
पत्त न के बज्जर पड़ि रौ
कि, पंचेश्वर में आजि
"बाँध " बणन लागि रौ।
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इक "तार" जुड़ी रयी छ
कभै-कभै करेंट ऐ पड़ों
आ्ँङ में .........
त्यार गोरु म्या्र बकारा
घा काटूँलो दगाड़ - दगाड़ा
मा्ँङ में ........
ऐ बाटा तु ऐये उ बाटी मैं ऊँन
मनखिनौ को काम छ भागी
खाल्ली चै रुँन ........
मेरि माया छ मौ जसी
दुन्नी बजी रै अँणकसी
आफि रुँछि , ढुँङ में।
शब्दार्थ:
थामींन - रुकना,
चार - तरह,
सिमार - मैदान,
स्या्र (सेरा) - समतल जमीन,
नाज - अनाज,
कुथव - बोरे,
आ्ँङ - शरीर,
मा्ँङ - घास वाली जगह,
चै रुँन - देखते रहना,
मौ - शहद,
अणकसी - अजीब,
ढुँङ में - भाड़ में
शब्दन'कि गलती ठीक करि दिया हो
July 11,12, 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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