आपण बुणी जाव

कुमाऊँनी कविता- आपण बुणी जाव, Poem in Kumaoni language, self made trap, kumaoni Bhasha ki kavita

🌷🥀आपण बुणी जाव🌴🌺

रचनाकार:  प्रकाश पाण्डेय

अरे बड़ुवा मैं त्वे थैं के कूं , 
आपणै बुणी मकड़जाव में, 
आफी  है फंसि गयूं रे  मैं..... 

बड़ि हौस लागी रे जब, 
म्यार् गौंक् उमर स्वानिक,
मैंल इस्कूल जाण् देखीं , 
पाटि दवात कलम ल्ही बेर,
कसिक् पढ़ण हुणि बटीण्यू रे मैं!
 *अरे बड़ुवा०!!*

इज् बाबु थैं जिद्द करि , 
एक रबड़ौक् गिनु लिऐयूं , 
हमारै बाखइक ठुल पटांगण में , 
खेलण हुणि इकबटीणी सब, 
और खेलणौछी चैइये रयूं रे मैं..! 
*अरे बड़ुवा०!!* 

 जसिक-तसिक बढ़नै रयूं ,
 आपण जाव लै बुणनै रयूं ,
 गोरु बाछ घट पिसण तक , 
 किताब पढ़ण सामौव ल्यूण,
 कां कां तलक बोकनै रयूं रे मैं ..! 
*अरे बड़ुवा०!!* 

आजाक् दिन जाव जंजाव है रौ, 
रात  स्वैण में लै जावै  देखणयूं, 
आंख् खुलनी तो अलझी जानूं ,
जाव खोलण सित् मित् न्हाति, 
यो धात लगै कै दिनूं रे मैं..  ! 
*अरे बड़ुवा०!!*

 चारै दिशन् में हात खुट फतोड़ि,
 भैर - गौं  शहर  सब्बै देखि, 
 काव् बुलबुलांकि शान हुंछी, 
 सुकिलि आज रंगत है  रैछ, 
 फिर लै जांठ् टेकि हिटणयूं रे मैं... ! 
*अरे बड़ुवा मैं त्वे थैं के कूँ०..!!*

🙏 प्रकाश पाण्डेय, हरिद्वार 🙏

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