
जिम कार्बेट पार्काक् शेर......
रचनाकार: ज्ञान पंत
हिसालु त्वा्प जसी
किनमड़
नि खायी कर ....
लोग- बाग
मैं साँका्ल ...
कसि "लाली" ला कै।
...................
बौब कट फैसन में
तेरि लटि
बिजुलि जसि
अगाश में........
गूड़ैकि भेलि
लाटा 'क अँङाव् में
शिबौ , कसिक बतूँ
आ्ब
कतु "गुई" छ।
.........................
चौमास 'न में त
गाड़
गध्या्र
रौड़
सबै अतरनीं .....
तु
रुढ़िन 'कि ले
सोची कर।
..................
अन्या्र
और उज्या्व में
झिट घड़ी 'क
फर्क छ।
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बरफ
हिमालै मैयी नै
मनखिनां बीच में ले
जामै बल ......
गा्ँठ
दुब ज्यौड़ मैयी नै
समबन्धन् मे ले
पाड़ी जानीं बल ....
ओड़्
खेतन मैयी नै
मन भितेर ले
हुनन् बल ...
पटया्ल
पाखन मैयी नै
घरन् में ले
लाग्नी बल् .....
यसी कै
एक चुल'क
द्वि, तीन और
कभै चार हुँनीं बल।
शब्दार्थ:
मैं साँकाल - मेरी शिकायत करेंगे,
लाली - लिपिस्टिक ,
लटि - (बालों की ) चोटी,
लाटा - गूँगा,
अँङाव - बाहों में,
गुई - मीठा,
रुढ़िन - गरमी की,
झिट घड़ी - थोड़ी देर
हिमालै - हिमालय,
दुब ज्योड़ - अनेक गाँठ लगा विशेष डोरा,
ओ्ड़ - दो खेतों को अलग करता पत्थर,
हुनन् - होते हैं
पटया्ल - लकड़ी के चोड़े पटरे,
पाखन् - छतों में,
चुल - चूल्हे
July 08,09, 2017

...... ज्ञान पंत
ज्ञान पंत जी द्वारा फ़ेसबुक ग्रुप कुमाऊँनी से साभार
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