श्रीमद्भगवतगीता - कुमाऊँनी भाषा में अट्ठारूं अध्याय (श्लोक २१ - ३२)

कुमाऊँनी भाषा में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्, interpretation of ShrimadBhagvatGita in Kumauni Language

कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्

 अट्ठारूं अध्याय - श्लोक ( बटि ३२ तक)

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ।।२१।। यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तुमहेतुकम्। अतत्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।। नित्यं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विक मुच्यते।।२३।। यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्।।२४।। अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते।।२५।। कुमाऊँनी:मनखि जब अलग-अलग शरीरौं में अलग-अलग जीव द्येखौं त् ऊ ज्ञान कैं राजसी ज्याणौ। ऊ ज्ञान तामसी कयी जां जैक् कारण मनखि बिना सत्य ज्याणियै, निकृष्ट कार्य कैं सब कुछ मानि बेर् करूँ। जो कर्म नियमित छू, आसक्ति और राग-द्वेष है परे छू, और कर्मफलैकि इच्छा है रहित छू ऊ ज्ञान कैं सात्विकी ज्याणौं। जो काम सिर्फ अपणि इच्छा पुरि करणक् ल्हिजी और अहंकार क् भावैल् करी जां ऊ काम रजोगुणी बतै रौ। जो मोहवश, शास्त्रौक् आदेश विरुद्ध या भावी बन्धनैकि चिन्ता करी बगैर करी जां और दुहरै कैं कष्ट पुजणाक् ल्हिजी करी जां, ऊ काम तामसी कयी जां। (अर्थात् अहंकार, मोह, लालच , राग-द्वेष और दुहरै कैं क्ये लै प्रकारैल् कष्ट द्यिण यों सब सात्विक विचारों वाल् मनखि ल्हिजी वर्जित बतै रयीं। शास्त्रों क् आदेश कैं बिना शंका करियै मानण यौ ई मनखिक् शास्वत धर्म छू। जब हम अपंणि लीक बटी हटि जनूं त् अधर्म क् रस्त पार् चलण लागि जनूं तब अधर्म क् रस्त भले ही पैली- पैली भौत्तै भल् लागूं पर वीक अन्त दुखदायी और महा कष्ट द्यिणी वाल् हूँ।)

हिन्दी= जिस ज्ञान से कोई मनुष्य विभिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न प्रकार के जीव देखता है, तुम उसे राजसी जानो। और वह ज्ञान, जिससे मनुष्य किसी एक प्रकार के कार्य को, जो अति तुच्छ है, सब कुछ मानकर , सत्य को जाने बिना उसमें लिप्त रहता है, तामसी कहा जाता है। जो कर्म नियमित है और जो आसक्ति, राग-द्वेष से रहित और कर्मफल की चाह के बिना किया जाता है, सात्विक है। लेकिन जो कार्य अपनी इच्छा पूर्ति के निमित्त, प्रयासपूर्वक एवं मिथ्या अहंकार के भाव से किया जाता है, राजसी कहा जाता है। जो कर्म मोहवश, शास्त्रीय आदेशों की अवहेलना करके तथा भावी बन्धन की सोचे बिना या हिंसा अथवा अन्यों को दुःख पहुंचाने के लिए किया जाता है, वह तामसी कहा जाता है।

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी    धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते।।२६।।
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हंसात्मकोऽशुचिं।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसाः परिकीर्तितः।।२७।।
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोनलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उचायते।।२८।।
बुद्धेर्भेदं  धृतिश्चैव    गुणतस्त्रिविधं   शृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय।।२९।।

कुमाऊँनी:
जो मनखि भौतिक गुणौंक् प्रभाव में आयी बगैर, अहंकार रहित,  संकल्प ल्हीबैर् और उत्साह पूर्वक अपंण कर्मूं कैं करूँ ऊ सात्विक कर्ता बतै रौ।  जो कर्ता कर्म या कर्मफलोंक् प्रति आसक्ति धरूँ, उनर् भोग करंण चां, जो लोभी, ईर्ष्यालु छु अपवित्र रूं और सुख-दुःख में विचलित है जां,  ऊ राजसी छू।  जो कर्ता हमेशा  शास्त्रों क् विरुद्ध काम करूं, जो भौतिकवादी छू, हठी छू, कपटी छू, दुसरौक् अपमान करण में माहिर छू, आलसी और काम कैं लटकूंण में अपंणि हुस्यारी समजूं , ऊ तामसी छू।  हे अर्जुन! आब् मैं तुमूंकैं प्राकर्तिक तीन गुणों अनुसार अलग-अलग प्रकारैकि बुद्धि और धैर्य क् बार् में बतूनूं, तुम ध्यानैल् सुंणिया।
(अर्थात्  मली बतायी गुण-दोषन् कैं ध्यान दिबेर् हमूकैं कर्म करण चैनीं,  किलैकि मरणक् बाद  सैणि,  च्यल् या रिश्तेदार आदि (जनर् ल्हिजी हमुल् नक्-भल् कर्म करिबेर् सम्पत्ति जोड़ी) क्वे लै हमरि सहायता नि करि सकन्।  वां (नरक या स्वर्ग) में हमूकैं अपंणि लडैं अपंण कर्मूं कै आधार पर लड़ण पडैलि।  तब राग-द्वेष, लोभ, छल-कपट, अहंकार  और आलस करिबेर् क्ये हौल्? सत्यवादी,  परोपकारी और निर्हंकारी मनखि हर जाग्, हर देस और हर परिस्थिति में पूज्य हूँ।)

हिन्दी= जो व्यक्ति भौतिक गुणों के संसर्ग  बिना अहंकार रहित संकल्प तथा उत्साहपूर्वक अपना कर्म करता है, वह सात्विक कर्ता कहा जाता है।  जो कर्ता कर्म तथा कर्मफल के प्रति आसक्त होकर फलों का भोग करना चाहता है, तथा जो लोभी, सदैव ईर्ष्यालु, अपवित्र और सुख-दुख से विचलित होनेवाला है, वह राजसी कहा जाता है। जो कर्ता सदा शास्त्रों के आदेश के विरुद्ध कार्य करता रहता है, जो भौतिकवादी, हठी, कपटी तथा अन्यों का अपमान करने में पटु है तथा आलसी, सदैव खिन्न तथा कार्य करने में विलम्ब करने वाला है, वह तामसी कहा जाता है।  हे धनञ्जय! अब मैं प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार तुम्हें विभिन्न प्रकार की बुद्धि तथा धृति के विषय में विस्तार से बताऊंगा, तुम इसे ध्यान पूर्वक सुनो।

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कर्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी।।३०।।
यया   धर्ममधर्मं  च  कार्यं  चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी।।३१।।
अधर्मं  धर्ममिति  या  मन्यते  तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी।।३२।।

कुमाऊँनी:
हे अर्जुन! जो बुद्धि द्वारा मनखि यौ ज्याणि ल्यूं कि करण योग्य को कर्म छू और को कर्म नि करंण चैन्, डर कैक् करंण चैं और कैक् डर नि करंण चैन्, ऊ बुद्धि सात्विक बुद्धि छू।  जो धर्म-अधर्म या करंण लैक् और नि करंण लैक् कर्मों में भेद नि करि सकैंनि ऊ बुद्धि कैं राजसी बुद्धि ज्याणौ।  जो अहंकार क् कारण धर्म कैं अधर्म और अधर्म कैं धर्म समजीं या हमेशा उल्टि दिशा में ई जाणक् ल्हिजी प्रेरित करीं ऊ बुद्धि कैं तामसी बुद्धि कैं बेर् ज्याणौ।
(अर्थात्  बुद्धि कैं यदि विवेक रूपी तराजु में नि तौली जाओ त् अर्थौक् अनर्थ हुंण में देर नि लागनि।  येक् ल्हिजी जो बुद्धिक् दगड़-दगड़ै विवेकवान् लै छीं यस्  मनखि कभ्भीं उल्ट रस्त पार् न त् आपू चलन् और न दुहरै कैं जांण दिन्।  हमूं कैं हमेशा यस् सत्पुरुषोंकि संगत करंण चैं।)

हिन्दी= हे पृथापुत्र! वह बुद्धि सतोगुणी है, जिसके द्वारा मनुष्य यह जानता है, कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं है, किससे डरना चाहिए और किससे नहीं,  क्या बांधने वाला है और क्या मुक्ति देनेवाला है।  जो बुद्धि धर्म तथा अधर्म में और क्या करने योग्य है, क्या नही, इसमें भेद नहीं कर पाती, वही राजसी बुद्धि है। जो बुद्धि मोह तथा अहंकार के वशीभूत होकर अधर्म को धर्म और धर्म को अधर्म मानती है, या सदैव विपरीत दिशा में प्रयत्न करती है वही तामसी बुद्धि है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार

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