श्रीमद्भगवतगीता - कुमाऊँनी भाषा में चौदहऊं अध्याय (श्लोक ०१-०९)

कुमाऊँनी भाषा में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्, interpretation of ShrimadBhagvatGita in Kumauni Language

कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्

 चौदहऊं अध्याय - श्लोक (१ बटि ०९ तक)

श्रीभगवानुवाच- परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम्। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः।।१।। इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः। सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।। २।। मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्। सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत।।३।। कुमाऊँनी:भगवान् ज्यु कुनई कि- हे अर्जुन! आब् मैं तुमूंकैं सब ज्ञानूं में जो श्रेष्ठ छू ऊ परम ज्ञान कैं बतूनूं, जै कैं ज्याणणक् बाद ऋषि-मुनियोंल् परम सिद्धि प्राप्त करी। यौ ज्ञान में स्थिर हुंण पार् मनखी मेरि दिव्य प्रकृति (स्वभाव) कैं प्राप्त करि सकूं और ये में स्थित हूंण पार ऊ सृष्टिक् समय न त् पैद् हुंन् और न प्रलय बखत विचलित (भयभीत) हुंन्। ब्रह्म नामक् सब्बै भौतिक् वस्तु जन्मक् स्रोत छन् और यौ ई ब्रह्म कैं मैं अपंण गर्भ में धरनू जैक् कारण सब जीवोंक् जनम् सम्भव छू। (अर्थात् तेरूं अध्याय में बतायी गो कि विनयपूर्वक प्राप्त करी हुई ज्ञान और ऊ ज्ञानक् आधार पार् करी हुई काम द्वारा भव-बन्धन है छुटकार सम्भव छू, प्रकृतिक् गुणों में उलझणाक् कारण जीव भौतिक जगत् में बध्य (बांधी हुई) छू। जब मनखी ज्ञान द्वारा प्राप्त उज्याव में भगवान् ज्यु कैं द्येखों त् वीक् सब संशय खतम् है जनीं और ऊ यौ भौतिक संसार में अपंण ऊणौंक् कारण लै समजि जां, तब ऊ मनखी अपंण और प्रकृतिक् उत्थान में लै जां और सिद्धि यानि लक्ष्य प्राप्त करंण में सफल हूंछ।)
हिन्दी= श्रीभगवान् कहते हैं- अब मैं तुमसे समस्त ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ इस परम ज्ञान को पुनः कहूंगा, जिसे जान लेने पर समस्त मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की है। इस ज्ञान में स्थिर होकर मनुष्य मेरी दिव्य प्रकृति (स्वभाव) को प्राप्त कर सकता है। ,इस प्रकार स्थित हो जाने पर वह न तो सृष्टि के समय उत्पन्न होता है न प्रलय के समय विचलित ही होता है। ,हे अर्जुन! ब्रह्म नामक समग्र भौतिक वस्तु जन्म का स्रोत है और मैं इस ब्रह्म को गर्भस्थ करता हूँ, जिससे समस्त जीवों का जन्म सम्भव है।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता।।४।।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमब्ययम्।।५।।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ।।६।।
कुमाऊँनी:
हे अर्जुन! तुम यौ समजौ कि सब्बै परकाराक् जीव-योनि यौ संसार में जन्म द्वारा ई सम्भव छन् और मैं उनर् बीज- प्रदाता पिता छूं। भौतिक प्रकृति तीन गुणों वाई छू -सत् , रज और तम। जब जीव परकरतीक् संसर्ग में ऊं त् ऊ इन गुणों दगड़ बांदी जां। आब् सतोगुण और गुणन् है ज्यादे शुद्ध हुणाक् कारण प्रकाश प्रदान करणीं और मनखी कैं सब्बै पापकर्मन् है मुक्त करंण वाल् छू, जो लोग यौ गुण (सतोगुण) मे स्थित रूंनी, ऊं सुख और ज्ञानक् भाव में बांदी जनीं।
(अर्थात् परमात्मा यौ सृष्टि और जीवधारियों क् जन्मदाता (पिता) कयी जां, संसार में कतुक प्रकारक् जीव हुंनी (जलचर, थलचर, नभचर) आदि-आदि और उनरि अपंणि-अपंणि जिन्नगी, क्रियाकलाप, खान-पान, और व्यवस्था छू। परन्तु भौतिक प्रकृति क् संसर्ग में ऊंण पार् उपरोक्त तीन गुणों क् असर ऊनूं पार् हुंण जरूरी छू। सतोगुण कै और गुणन् है शुद्ध बतूनी जैक् कारण सतोगुण अध्यात्मिक प्रकाश करणीं, और मनखी कैं वीक् पूर्वजन्माक् पापन् है मुक्त करणीं बतूनी। जो मनखि यौ गुण में स्थित है जां ऊ लै सुख और ज्ञानक् बन्धन में बांदी जां। जै श्रीकृष्ण ज्यु दगणियो)
हिन्दी= हे कुन्तीपुत्र! तुम यह समझ लो कि समस्त प्रकार की जीव-योनियां इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा सम्भव हैं और मैं उनका बीज-प्रदाता पिता हूँ। भौतिक प्रकृति तीन गुणों से युक्त है- सत, रज और तम । हे महाबाहु! जब शास्वत जीव प्रकृति के संसर्ग में आता है, तो वह इन गुणों से बंध जाता है। सतोगुण अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होने के कारण प्रकाश प्रदान करनेवाला और मनुष्यों को सारे पापकर्मों से मुक्त करनेवाला है। जो लोग इस गुण में स्थित होते हैं, वे सुख तथा ज्ञान के भाव से बंध जाते हैं।

रजां रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्।।७।।
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिन्म्।
प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत।।८।।
सत्वं सुखे सञ्जयन्ति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत ।।९।।
कुमाऊँनी:
हे अर्जुन! अनेक आकांक्षाओं और तृष्णाओं क् कारण रजोगुणैंकि उत्पत्ति हैं, जैक् कारण मनखी सकाम कर्मूं दगड़ बांदी रूं, और अज्ञानक् कारण तमोगुण पैद् हूं, पागलपन, आलस और निद्रा यैक् गुण छन्। यौ प्रकारैल् तमोगुण सुख दगड़ बादों, रजोगुण सकाम कर्मूं दगड़ बादों और तमोगुण आलस और प्रमाद दगड़ मनखी कैं बादों।
(अर्थात् रजोगुण और तमोगुण है सतोगुण श्रेष्ठ छू। रजोगुणी मनखि इन्द्रियतृप्ति कैं अपंण जीवनक् उद्येष्य ल्हि बेर् चलूँ और तमोगुणी इर्ष्या, द्वेष क् कारण पागलपनैंकि स्थिति तक पुजि जां। जबकि सतोगुणी मनखि अपंण और समाजैकि भलाई बार् में सोचों और सुखी रूं।)
हिन्दी= हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण की उत्पत्ति असीम आकांक्षाओं तथा तृष्णाओं से होती है और इसी के कारण से यह देहधारी जीव सकाम कर्मों से बंध जाता है। तुम जान लो कि अज्ञान से उत्पन्न तमोगुण समस्त देहधारी जीवों का मोह है। इस गुण के प्रतिफल प्रमाद(पागलपन), आलस्य तथा निद्रा हैं, जो बध्य जीव को बांधे रहते हैं। इस प्रकार सतोगुण मनुष्य को सुख से, रजोगुण सकाम कर्म से और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढक कर उसे प्रमाद (पागलपन) से बाँधता है।

जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार

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