
फरक...फरक...फरक...
रचनाकार: रेखा उप्रेती
ज दिन बटि
देखि
दिलवाले दुल्हनियाँ...
आ'स लागि रौ
पहाड़
जसि क्यै
कूण रौ छी 'राज'
उसि क्यै
वील लै सोचि छू
" पहाड़ा!!
य जो पहाड़ी मैस
न्हैँ ग्येईं
बसि ग्येईं
दूर-दूर
अगर
तु कं भल माननि
त
तौ लै फरका'ल
ज़रूर"
और तब बटि
पुकारणैँ में लागि रौ
मनैs मन
पहाड़
'फरक...
फरक...
फरक...'
क्वे नि फरकण रौय रे...
(रेखा उप्रेती)
21-07-2020
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