
कुमाऊँनी में श्रीमद्भगवतगीता अर्थानुवाद्
दशूं अध्याय - श्लोक (०१ बटि ११ तक)
श्रीभगवानुवाच-
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया।।१।।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ।।२।।
कुमाऊँनी:
आब् भगवान् ज्यु कुनई कि - हे अर्जुन! तुम त् म्यर् खास मित्र छा, येक् ल्हिजी मैं तुमूंकैं यस् ज्ञान बतूंणयू जो आजि तक मिल् नि बतै रौ, ऊ हैबै लै श्रेष्ठ छू। देवगण या महर्षिगण मेरि उत्पत्ति या ऐश्वर्य कैं नि ज्याणन् किलैकि मैं इन सब्बूंक् कारणस्वरूप अर्थात उद्गम छूं।
(अर्थात्- भगवान् कृष्ण परमेश्वर छन् उनूंहै आघिल् त् क्वे लै न्हैति, उनरि द्वारा सकल सृष्टिकि रचना करी भै तो क्वे द्याप्त या ऋषि मुनि उनूकैं कसिक् ज्याणि सकूँ। हमरि सोचणैकि या समजणैकि शक्ति सीमित छू, येक् कारण हमन् कैं विवाद में नि पड़ण चैन् और भगवान् ज्यु क् ध्यान करते हुए अपंण भौतिक कार्य सम्पन्न करंण चैनीं।)
हिन्दी= श्रीभगवान् ने कहा- हे अर्जुन! आगे सुनो,चूंकि तुम मेरे प्रिय सखा हो, अतः मैं तुम्हारे लाभ के लिये एसा ज्ञान प्रदान करूँगा, जो अभी तक मेरे द्वारा बताये गये ज्ञान से श्रेष्ठ होगा। न तो देवतागण मेरी उत्पत्ति या ऐश्वर्य को जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं, क्योंकि मैं सभी प्रकार के देवताओं और महर्षियों का भी कारणस्वरूप (उद्गम) हूँ।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।।३।।
बुद्धिर्ज्ञानसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः।
सुखं दुःखं भवोऽभावोभयं चाभयमेव च।।४।।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः।।५।।
कुमाऊँनी:
जो मिकैं अनादि, अजन्मा और समस्त लोकों क् स्वामी यौ रूप में ज्याणौं, केवल वी मनखी मोहरहित और समस्त पापन् है मुक्त छू। बुद्धि, ज्ञान, संशय, मोह है मुक्ति, क्षमाभाव, सत्यता, इन्द्रियनिग्रह, मननिग्रह, सुख और दुःख, जन्म, मरण, डर, निडर, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान , जस और अपजस-जीवों क् यौ सब्बै गुण म्यरै द्वारा उत्पन्न छन्।
(अर्थात् भगवान् ज्यु कुनई कि- संसारैकि जो लै क्रिया छू सब म्यरै द्वारा उत्पन्न छू, पर जो मनखी वेद-शास्त्रों क् या गुणीजनूंक् अनुसार चलूँ वी ज्ञानी या धर्मात्मा छू। भगवान् ज्यु क् बार् में संशय घातक छू, और विश्वास फलदायी। उसीक् लै व्यवहारिक रूप में हम द्यखनूं कि अविश्वाशी हमेशा दुःखी रूं और जो विश्वास करूँ (भले ही वीकैं ध्वक् मिलों पर ऊ यौ बात पार् सन्तोष करूँ कि मिल क्ये गलत नि कर, यौ ई निष्ठा हमूकैं भगवानक् उज्याणि ल्हिजैं।)
हिन्दी= जो मुझे अजन्मा, अनादि, समस्त लोकों के स्वामी के रूप में जानता है, मनुष्यों में केवल वही मोहरहित और समस्त पापों से मुक्त होता है। बुद्धि, ज्ञान, संशय तथा मोह से मुक्ति, क्षमाभाव, सत्यता, इन्द्रियनिग्रह, मननिग्रह, सुख तथा दुःख, जन्म, मृत्यु, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि ,तप दान, यश तथा अपयश-जीवों के ये विविध गुण मेरे ही द्वारा उत्पन्न हैं।
महर्षयः सप्तदशः पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः।।६।।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।।७।।
कुमाऊँनी:
सप्तऋषि, और उनूंहै पैली चार महर्षि (सनक, सनन्ददन, सनातन और सनत्कुमार) और सब्बै मनु यौं सब म्यर् मनैल् पैद् हई छन् ,और विभिन्न लोकूं में निवास करणीं सब्बै जीव उनूंहै पैद् हुंनी। जो म्यर् यौ एश्वर्य कैं समजि बेर् पूर्ण रूपैल् आश्वस्त छू, ऊ मेरि भक्ति में तत्पर रौं, ये में तनिक लै संदेह न्हैंति।
(अर्थात् यौ ब्रह्माण्ड में अनेकों लोक छन् और विभिन्न प्रकारक् प्राणी इन लोकूं में निवास करनीं, जो उपरोक्त इन महर्षियों क् संचालन में गतिमान रूनीं। सब जीवधारियों में सिर्फ एक मनुष्य यस् प्राणी छू जो नक्, भल्, ज्ञान, विज्ञान, हित अनहित कैं समजि सकूँ और सन्मार्ग पर चलि बेर् अपुंण उद्धार लै करि सकूँ। येक् ल्हिजी भगवान् पार् अटूट विश्वास और श्रद्धा हुंण चैं, जब भगवान् ज्यु पार् श्रद्धा और विश्वास हौल् त् फिरि गलत काम करणैंकि बुद्धि उपजौ ई नै, और सई काम करणीं मनखि यौ लोक् और परलोक में यश प्राप्त करौं यस् सब्बै ज्याणनीं।
हिन्दी= सप्तऋषिगण तथा उनसे भी पूर्व चार अन्य महर्षि (सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत्कुमार) एवं सारे मनु, ये सब मेरे मन से उत्पन्न हैं और विभिन्न लोकों में निवास करनेवाले सारे जीव उनसे अवतरित होते हैं। जो मेरे इस ऐश्वर्य तथा योग से पूर्णतया आश्वस्त है, वह मेरी अनन्य भक्ति में तत्पर होता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता।।८।।
मच्चिता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।।९।।
कुमाऊँनी:
भगवान् ज्यु कुनई कि- मैं सब्बै आध्यात्मिक और भौतिक जगत् क् कारण छूं। जो बुद्धिमान लोग यस् ज्याणनीं या समजनीं ऊं मेरि भक्ति में लागी रूनीं और पुर् मनैल् मेरि पुज करनीं। म्यर् भक्तों क् मन में जो विचार ऊंनी ऊं सब मि में ई निवास करनीं, उनौर् जीवन मेरि सेवा में अर्पित रूं, और ऊं एक दुहरै कैं ज्ञानक् अदव-बदव करते हुए और म्यर् बार् में बातचित करते हुए भौत्तै सन्तोष और आनन्द प्राप्त करनीं।
(अर्थात् भगवान् ज्यु है अलावा क्वे लै सुखकारी न्हैति, मनखि जून यैकै ल्हिजी मिलि रै कि जो लै हमर् बाट् टुटि गो उजड़ि गो ऊकैं ठीक करूँ सुधारू, और सुधारणक् काम क्वे कठिन लै न्हैति, भगवान् ज्यु क् ध्यान और दरिद्रजनूं कि सेवा में जो अपुंण जीवन लगे दिनीं त् समजो उनूल् अपुंण बाट् सुधारि है। भौतिक सुख विनाशकारी छन् जै में देह, बुद्धि और मन मलीन है जां और मलीन देहैल् भगवान् ज्यु क् नजीक नि जै सकन्, मलीन बुद्धि में कुविचार नि ऊन् और मलीन मनैल् भगवद्सुमिरन नि है सकौन्। तो हमूकैं अपणि-अपणि देह, बुद्धि और मन कैं शुद्ध करणैकि जर्वत् छू। बस यौ ई त् भजन छू।)
हिन्दी= मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगत का कारण हूँ, प्रत्येक वस्तु मुझ ही से उद्भूत है। जो बुद्धिमान यह भलीभाँति जानते हैं, वे मेरी प्रेमाभक्ति में लगे रहते हैं तथा हृदय से मेरी पूजा में तत्पर होते हैं। मेरे भक्तों के विचार मुझमें वास करते हैं, उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान का आदान-प्रदान करते तथा मेरे विषय में वार्ता करते हुए परम सन्तोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।१०।।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।।११।।
कुमाऊँनी:
भगवान् ज्यु कुनई कि- जो प्रेमपूर्वक/श्रद्धापूर्वक मेरि सेवा में लागि रूनीं उनूकैं मैं, उनार् हृदय में वास करते हुए उनर् अज्ञान द्वारा उपजी हुई अंधकार कैं ज्ञानक् दियैल् उज्याव करिबेर् दूर करनूं और अपुंण नजीक उणक् रस्त बतूनूं।
(अर्थात् जब मनखि भगवान् ज्यु दगड़ अपुंण सम्बन्ध दृढ़ करौं त् भगवान् ज्यु वीक् ल्हिजी स्वयं रस्त् बणैं दिनीं। माया, ममता, लोभ, मोह यौं सब अंधकारक् तरफ्यां जणांक् रस्त् छीं, जब भगवान् ज्यु कि कृपा हैंछ त् मनखि यौ बात कैं समजि जां और उज्यावैकि तरफ्यां जां तब भगवान् ज्यु क् दर्शन लै हुंनी और जीवन लै सुधरि जां।)
हिन्दी= जो प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करने में निरन्तर लगे रहते हैं, उन्हें मैं ज्ञान प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझ तक आ सकते हैं। मैं उन पर विशेष कृपा करने हेतु उनके हृदय में वास करते हुए ज्ञान के प्रकाशमान दीपक के द्वारा उनका अज्ञानजन्य अंधकार दूर करता हूँ।
जै श्रीकृष्ण
(सर्वाधिकार सुरक्षित @ हीराबल्लभ पाठक)
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स्वर साधना संगीत विद्यालय लखनपुर, रामनगर
श्री हीरा बल्लभ पाठक जी की फेसबुक वॉल से साभार
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