
कुमाऊँ के चंदकालीन परगने- छखाता (भाग-०२)
(कुमाऊँ के परगने- चंद राजाओं के शासन काल में)
"कुमाऊँ का इतिहास" लेखक-बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार
नैनीताल
यह नगर अँगरेज़ों का बसाया हुआ है। सन् १८४१ से यह बसने लगा। इससे पहले यहाँ जंगल था। सिर्फ़ नैनादेवी के मंदिर में मेला लगता था। सन् १८४१ में रोजा-शराब-फैक्टरी के साहब मिस्टर बैरन ने इसे देखा। इससे पहले कुमाऊँ के दूसरे कमिश्नर मिस्टर ट्रेल ने भी देखा था। बैरन साहब ने 'हिम्माला' नामक पुस्तक में लिखा है वहाँ के थोकदार नरसिंह नैनीताल को पवित्र देवता की भूमि समझकर अंग्रेजों को नहीं देना चाहते थे। पर उन्होंने उनको अपनी बिठाया, और कहा कि वह उनकी नोटबुक में दस्तखत करें कि नैनीताल में उनका कुछ हक़ नहीं, अन्यथा वे उन्हें डुबा देंगे। नरसिंह ने डर के मारे दस्तखत कर दिये। तालाब के किनारे बहुत-से आदमी खड़े थे। उन्होंने नोटबुक के लेख को आश्चर्य से देखा। बाद को यही थोकदार नरसिंह ५) रु. माहवार में नैनीताल के पटवारी बनाये गये। १८४१ से नैनीताल बनना शुरू हुाआ। श्रीलशिंटन कमिश्नर ने एक कोठी बनवाई। भारतीयों में सबसे पहले लाला मोतीराम साहजी ने कोठियाँ बनवाई। उस समय ।।।) ऐकड़ जमीन बेची गई थी।
प्रान्तीय लाट यहाँ सन् १८५७ के पश्चात् रहने लगे। सन् १८६२ में, रामजे-अस्पताल के पास उअस्पताल के पास उनकी कोठी बनी। बाद सन् १८७९ से १८९५ तक लाट साहब की की कोठी सेन्ट लू में रही। सन् १८८५ में दरारें पड़ने से वह भवन खतरनाक समझा गया। लाट साहब शेरउड में रहे। १९०० में नया वर्तमान विशाल भवन बनवाया गया। लाटों में सबसे पहले यहाँ (१) माननीय डूमंड साहब आये। सन् १८६५ में उन्होंने शेर के डाँडे में घर बनवाया। १८७९ में उसे बेचकर चले गये। इस मकान में किराये पर ये लाट रहे-
(२) सर विलियम म्यूर
(३) सर जॉन स्ट्रेची
(४) सर जॉर्ज कूपर
सर जॉर्ज कूपर ने सेंट लू में भवन बनवाया। उसमें उनके बाद
(५) सर अलफ्रेड लायल,
(६) सर आकलैंड कालविन,
(७) सर चार्ल्स क्रोस्वेट और
(८) सर ऐन्टनी मैकडानल प्रभृति लाट रहे।
सन् १८९५ में यह भवन छोड़ा गया। १८९५ से १६०० तक आप 'शेरउड हाउस में रहे।
सन् १९०० में नया भवन बना। सर ऐन्टनी मैकडानल उसमें रहे। उनके पश्चात् ये लाट साहबान वहाँ रहते आये हैं
(९) सर जेम्स लाटूश
(१०) सर जॉन हिवेट
(११) सर जेम्स (अब लॉर्ड ) मेस्टन
(१२) सर हारकोर्ट बटलर
(१३) सर विलियम मैरिस
(१४) सर ऐलेक्जेंडर म्यूडीमैन
(१५) सर मालकम हेली।
(१६) सर हैरी हेग (वर्तमान )
हमने अस्थायी लाटों का नाम नहीं दिया, पर नवाब सर सैयद अहमदखाँ (नवाब छतारी) का जिक्र करना आवश्यक है, क्योंकि इस प्रांत के भारतवासियों में वह सबसे प्रथम हैं, जो ४ माह तक यहाँ सर म्यूडीमैन के मरने पर लाट रहे, और सन् १९३३ में भी एप्रिल से लेकर साल के अंत तक लाट रहे।
पहला असेम्बली रूम सन् १८८० में पहाड़ खिसकने से दब गया, तब दूसरा असेम्बली रूम (नाचघर) सन् १८८१ में बना। सन् १९३० में आग से जल जाने के कारण वर्तमान असेम्बली रूम १९३२ में १८८०००) की लागत से बना।

रामज़े अस्पताल सन् १८९२ में बना, और क्रौस्वेट अस्पताल सन् १८६९ में। ये दोनों चंदे से बने। सन् १८८० में १५०" से भी ज्यादा वर्षा हुई। पहाड़ खिसका। कई मकान दब गये। बहुत आदमी मरे। तब से पहाड़ में ठौर-ठौर में नालियाँ बनाई गई, जिनसे पर्वत टूटने से बच गया। चुंगी-बोर्ड सन् १८४५ से जारी हुआ। तब आमदनी लगभग ८००-९०० रुपये की थी। अब ( १९३२ में । ५.०५.१२४) है। पहली कमेटी के सभापति जनरल रिचार्ड थे। मेम्बरान मि० लशिंटन, मि० आरनौल कप्तान बाह और कप्तान बेरन। १९१९ से बिजली का काम आरंभ हुआ और पहली सितंबर १९२२ में बिजली की रौशनी नगर में हो गई। सन १८४२ में कुल ४० बँगले और घर थे, जो इस प्रकार हो गये है-३३६ बंगले, २६० घर मल्लीताल बाजार में और २७९ घर तल्लीताल में। अभी नैनीताल बोर्ड में गैर सरकारी चेयरमैन नहीं हुआ। वहाँ के चेयरमैन १९३४ तक डि० कमिानर ही थे। सन् १९३४ से नामजद चेयरमैन बनाने का नियम बना है। पहली कोठी बैरन साहब ने बनवाई। इसका नाम पिलग्रिम लॉज' है। यह १८४१ में बनी थी।
शिक्षालय-सबसे प्रथम मिशनवालों ने १८५० के लगभग, मिशन स्कूल खोला। तब छात्र-संख्या ५० से कम थी। १९०४ में यह इम्फ्री हाईस्कूल हो गया। १९२५ में सरकार ने स्कूल-भवन ७५०००) में खरीदा। १९२७ तक स्कूल चलाया। सन् १९२८ में स्व. दानवीर लाला चेतराम साह ठुलवरियाजी ने ५०,०००) का दान दिया। अतः आक्टोबर १९२८ से इसका नाम चेतराम हाईस्कूल हो गया। इसका प्रबंध एक कमेटी करती है। सन् १९२३ में छात्र-संख्या ६६, और सन् १९३३ में २८३ थी।
सरकारी स्कूल-वर्तमान सरकारी स्कूल १९१० में सरकारी हुआ। इसकी नींव १८९६ में डाली गई थी। नींव डालनेवाले बाबू कृष्टोदास तथा पं० वाचस्पति पंत वकील थे। पहले यह डाइमन्ड जुबली स्कूल के नाम से कहलाता था। वर्तमान भवन १९२४ में बना। १ अगस्त १९१० को छात्र-संख्या १०६ थी। सितंबर १६३३ में २८६ छात्र शिक्षा पाते थे।
यहाँ तीन कन्या-पाठशालाएँ हैं--(१) मॉडल. गर्ल्स स्कूल, (२) मिशन जनाना स्कूल और (३) भवानी कन्या-पाठशाला।
सन् १९२८ से चुंगी-बोर्ड ने बालकों के लिये शिक्षा अनिवार्य कर दी है। चुंगी-बोर्ड ये स्कूल अपने ख़र्च से चलाती है-
नाम स्कूल छात्र-संख्या
चुंगी-प्राइमरी स्कूल, मल्लीताल ३५०
चुंगी-प्राइमरी स्कूल, तल्लीताल २५०
चुंगी-प्राइमरी स्कूल, बब्रोलिया ( हरिजन १) ६०
इसके अलावा चुंगी बोर्ड ४०० रुपये चेतराम साह-हाईस्कूल को तथा १५०) मिशन-गर्ल्स स्कल को इमदाद देती है। यहाँ पर कई अँगरेजी स्कूल भी हैं:-
१. डायोसेसन स्कूल १८६६ में बना।
२. फिलेंडर स्मिथ स्कूल १८५५
३. श्रोक ओपनिंस स्कूल १८८५
४. सेंट जोजेफ़ कॉलेज १८८८
अँगरेज़ी कन्या-पाठशालाएँ
१ डायोसेशन-गर्ल्स स्कूल १८७४
२ सेंट मेरी कनर्भटरामनी पार्क १८७८
३ बेलेज़ली-गर्ल्स स्कूल १८७८
इन स्कूलों में योरपियन और किरानी पढ़ते हैं। अब वे हिन्दोस्तानी लड़के भी पढ़ सकते हैं, जिनकी सिफ़ारिशे चल गई, और जो अँगरेज़ी फ्रेशन में रहते हों।

नैनीताल अच्छी बस्ती है। लाट, कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर, जंगलात गढ-कप्तानी के अलावा यहाँ फौज के बड़े बड़े दफ्तर हैं। एक छोटी-सी छावनी भी कैलाखान में है। ताल के किनारे उम्दा सड़क हैं। नैनादेवी का मंदिर, बैरन साहब लिखते हैं कि पहले तल्लीताल डाँट के पास था, जहाँ शायद अब डाकघर है। बाद को वह आजकल के बोट-हाउस के पास बनाया गया। पर उसके दब जाने से लाला मोतीराम साहजी ने इसे १८८० में वर्तमान जगह में बनाया।
ताल की लंबाई १५६७ गज और चौड़ाई ५०६ फ़ीट है। सबसे ज्यादा गहराई पाषाणदेवी के निकट है, जो ९३ फ़ीट के लगभग है। ताल ६३५० फीट की ऊँचाई है।
आस-पास के ऊँचे पर्वतों की ऊंचाई इस प्रकार है-अंयारपाटा ७६८९, देवपाटा ७९८९, हांनीवानी ७१५३, चीना ८५६८, आल्मा ७९८०, लड़ियाकांटा ८१४४ और शेर का डाँडा ७८६९।
बड़े-बड़े होटल दोनों अँगरेज़ी और भारतीय भी हैं। दृश्य यहाँ के दो सुहावने हैं। चीना पहाड़ से दूर-दूर तक के देश और पहाड़ दिखाई देते हैं। खेलकूद के लिये मल्लीताल में अच्छी भूमि (Flats ) है। रात को विजली की रोशनी में ताल की चमक से यह नगरी इन्द्रपुरी-सी ज्ञात होती है।

भवाली
ह नया नगर है। सन् १९८५ में यहाँ गड़कप्तानी का बंगला बना। सन् १९१२ में सेनिटोरियम खुलने से इस नगर की विशेष उन्नति हुई है। १८९५-१८९७ में तारपीन-फैक्टरी बनने से यहां अच्छी चहलपहल हो गई थी। पर १९१८ में इसके कलक्टरगंज बरेली को बदल जाने से नगर का रौनक कम हो गई। पहले यहाँ पर श्रीमलिन और श्रीन्यूटन साहबान ने चाय और फलों के बगीचे लगाए थे। १९१७ तक यह भीमताल नोटीफाइड एरिया में शामिल रहा। बाद को १९२३ से यहाँ अलग ही नोटीफाइड एरिया बन गई। यहाँ पर पलटन का पड़ाव भी है। अब यहाँ दूकानदारों व बँगलेदारों के अलावा क्षयरोग के रोगी ज्यादातर रहते है । भारत के सैनिटोरियमों में यह सबसे बड़ा व नामी है । भवाली से कुछ दूरी पर गेठिया से क्रेस्ट-नामक सैनिटोरियम एक और बन गया है।
भीमताल
चंद-राजाओं के समय से यहाँ पर अच्छी बस्ती होती आई है। बाद को कुछ चाय के बग़ीचे भी लगे। ताल ४५०० फीट की उंचाई में है। मोटरों के चलने से यहाँ की रोनक कम हो गई है। यहाँ के ताल में एक पक्का डाँट बना है, जिससे भावर की सिंचाई होती है। राजा बाजबहादुरचंद का बनवाया हुआ भीमेश्वर महादेव का मंदिर ताल के किनारे है। साम्प्रत में भीमताल में महाराज जिन्द का ग्रीष्म-निवास महल व अनेक कोठियाँ हैं। तल्लीताल और मल्लीताल बाज़ार, मिडिल स्कूल, पुलिस-चौकी, अस्पताल, तारघर, डाकघर आदि हैं।

अन्य बस्तियाँ-
गरम पानी में छोटा बाजार है। ज्योलीकोट तथा भूमियाँधार छोटी-छोटी बस्तियों है। बीरभट्टी में पहले अच्छी बस्ती थी, पर पहाड़ टूटने से यह वीरान हो गई है। शराब की भट्टी भी बंद है। रामगढ़ फलों तथा गर्मियों में अपनी स्वच्छ तथा स्वास्थ्यदायक जलवायु के लिये प्रसिद्ध है। एकांत स्थान है। श्रीनारायण स्वामी ने यहाँ पर आर्य-समाज भी खोला है।
मुक्तेश्वर-
जिसे मोतेश्वर कहते हैं, ७५०० फीट ऊँचे पर्वत पर बसा है। यह नैनीताल से २३ मील तथा अल्मोड़ा से १४ मील है। यहाँ एक प्रसिद्ध लेबोरेटरी (प्रयोगशाला) है, जिसमें जानवरों के रक्त को शुद्ध कर दवाइयाँ बनती हैं। १८६३ से यहाँ इसकी स्थापना हुई। अब यहाँ एक छोटी सी अच्छी बस्ती है। स्थान रमणीक है । यहाँ बड़ी-बड़ी इमारतें बनी हैं।
श्रोत: "कुमाऊँ का इतिहास" लेखक-बद्रीदत्त पाण्डे,
अल्मोड़ा बुक डिपो, अल्मोड़ा,
ईमेल - almorabookdepot@gmail.com
वेबसाइट - www.almorabookdepot.com
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